पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१७१

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भोजप्रबन्धः


 तदा राजा च तमाह -'बुद्धिसागर, राज्यमिदं सर्व दत्तं ; कवये। पत्नीभिः सह तपोवनं गच्छामि । तत्र तपोबने तवापेक्षा यदि मया सहागच्छ' इति । ततोऽमात्यः प्राह-'देव, तेन कविना कोटिद्रव्य- मूल्येन राज्यमिदं विक्रीतम् । कोटिद्रव्यं च विदुषे दत्तम्, अतो राज्यं भवदीयमेव । भुजदच' इति । तदा राजा च बुद्धिसागरं विशेपेण संमानितवान् ।

 तब राजा ने उससे कहा-'बुद्धिसागर, यह सारा राज्य कवि को दे दिया। पत्नी सहित वन जा रहा हूँ। यदि वहाँ तपोवन में तुम्हें मेरे साथ की अपेक्षा हो तो मेरे साथ आओ।' तव मंत्री बोला--'महाराज, एक करोड़ द्रव्य मूल्य में उस कवि ने यह राज्य बेच दिया है और एक करोड़ द्रव्य विद्वान् को दे दिया गया है, इस लिए राज्य आपका ही है । भोग कीजिए।' तो राजा ने बुद्धिसागर का विशेष संमान किया ।

(३०) तक्रविक्रती युवती

 अन्यदा राजा मृगयारसेनाटवीमल्ललाटन्तपे तपने नदेहः पिपासापर्याकुलस्तुरगमारुह्योदकार्थी निकटतटभुवमटस्तदलब्ध्वा परि- श्रान्तः कस्यचिन्महातरोरधस्तादुपविष्टः । तत्र काचिद्गोपकन्या सुकुमा- रमनोज्ञसर्वाङ्गा यदृच्छया धारानगरं प्रति तक्र विक्रीतुकामा नकमाण्डं चोद्वहन्ती समागच्छति। तामागच्छन्ती दृष्ट्वा राजा पिपासावशादेतद्धा- एडस्थं पेयं चेलिवामीति बुद्धथापृच्छत्--'तरुणि, किमावहसि' इति ।'

 एक और वार राजा आखेट के शौक में जंगल में घूम रहा था; जब सूरज सिर को तपाने लगा तो खिन्न-दुःखी, प्यास से अत्यंत व्याकुल, जल के लिए घोड़े पर चढ़ निकटवर्ती तट भूमि में घूमते-फिरते जल को न पा, थक कर एक बड़े वृक्ष के नीचे जा बैठा। उधर एक सुकुमार और मनोहर सब अंगों वाली ग्वाले की कन्या अपनी इच्छा से माठा बेचने के निमित्त माठे का वरतन लिये धारा नगर की ओर जाती, चली आ रही थी। राजा ने उसे 'आती हुई देखकर प्यास के वश हो यह सोचा कि इसके वरतन में यदि कोई पीने की वस्तु हो तो पिऊँ और पूछा-'हे तरुणी, क्या ले जा रही हो ?'