पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१६४

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भोजप्रवन्धः


'शिवशिरसि शिरांसि यानि रेजुः शिव शिव तानि लुठन्ति गृध्रपादे ।
अयि खलु विषमःपुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाक' ॥३०६॥

 तब भोज ने कालिदास से कहा-'सुकवे, तुम भी ( रामायण के ) कवि

के हृदय का भाव पढ़ो।' कालिदास ने कहा-

जो सिर सुशोभित थे शिवजी के मस्तक पर
शिव-शिव, गृध्र-चरणों में लुठित होना उनका !
मिलता हैं कैसा दारुण फल प्राणियों को
पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का !

 ततस्तस्य शिलाखण्डस्य पूर्वपुटे जतुशोधनेन कालिदासपठितं तमेव दृष्ट्वा राजा भृशं तुतोप।।

 तदनंतर उस शिला खंड के पहिले भाग में जतु शोधन क्रिया के द्वारा कालिदास के पढ़े गये ही पदों को देखकर राजा अत्यंत संतुष्ट हुआ ।

(२७) ब्रह्मराक्षमनिवारणम्

 कदाचिद्धोजेन विलासार्थ नूतनगृहान्तरं निर्मितम् । तत्र गृहान्तरे गृहप्रवेशात्पूर्वमेकः कश्चिद्ब्रह्मराक्षसः प्रविष्टः । स च नात्रौ तत्र ये वसन्ति तान्भक्षयति । ततो मान्त्रिकान्समाहूय तदुच्चाटनाय राजा यतते स्म । स चाडगाछन्ने मान्त्रिकानेव अक्षयति।किच स्वयं कवित्वादिकं पूर्वा- भ्यस्तमेव पठन्तिष्ठति। एवं स्थिते तत्रैव पक्षसि राजा 'कथमस्य निवृत्तिः इति व्यचिन्तयत् ।

 एक समय भोज ने आनंद-विलास के लिए एक और नया घर बनवाया। उस दूसरे घर में गृह प्रवेश मे पहिले ही एक ब्रह्मराक्षस प्रविष्ट हो गया । रात में जो वहाँ रहते थे, वह उन्हें खा जाता था। तो राजा ने मंत्रवेत्ताओं को - बुलाकर उसे भगाने का प्रयत्न किया; किंतु ब्रह्मराक्षस वहाँ से न जाकर मांत्रिकों को ही खा जाता और इसके अतिरिक्त राक्षस होने से पहिले की स्थिति में अभ्यस्त काव्य आदि का पाठ करता हुआ जमा रहता। राक्षस के

' ११ भोक