पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१६०

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भोजप्रवन्धः

 जिसमें ) है; जैसे प्रभात काल सुघटित चक्र अर्थात् चकई-चकवा का संघटन मलाप) करने वाला होता है, वैसे ही सुघटितचक्रा अर्थात् भली चक्राकार (गाल ) वनी है; और जिस प्रकार शिवजी की मूर्ति विधूमानल (विधु+ भाजनल ) अर्थात् चंद्रमा, पार्वती और तृतीय नेत्र की ज्वाला से युक्त है सा प्रकार विधूमानल अर्थात् घूमरहित अग्नि से सुशोभित है ।

 राजा ने अक्षर-अक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं।

 एकदा भोजराजोऽन्तगृहे भोगार्हास्तुल्यगुणाश्चतस्रोनिजागना अप- यत् । तासुच कुन्तलेश्वरपुत्र्यां पद्मावत्यामृतुस्लानम् , अङ्गराजस्य पुत्र्यां पन्द्रमुख्या क्रमप्राप्तिम् , कमलानाम्न्यां चद्य तपणजयलब्धप्राप्तिम् , अप्र- पाहण्यां च लीलादेव्यां दूतीप्रेषणमुखेनावानं च, एवं चतुरो गुणान्दृष्ट्वा तपु गुणेषु न्यूनाधिकमा राजाप्यचिन्तयत्। तत्र सर्वत्र दाक्षिण्यनिधी राज-राजः श्रीभोजस्तुल्यभावेन द्वित्रिघटिकापर्यन्तं विचिन्त्य विशेषानव- धारणेन निद्रां गतः । प्रातश्वोत्थाय कृताह्निकः सभामगात् ।

 एक बार भोजराज ने अंतः पुर में संमोग योग्य, समान गुणों वाली अपनी चार पत्नियों को देखा। उनमें कुंतलाधिपति की पुत्री पद्मावती मासिक ऋतु-स्नानकर चुकी थी, अंगराज की बेटी चंद्रमुखी की नियत पारी थी, कमला नाम की रानी ने जुए की वाजी में राजा को जीतकर उपलब्ध किया था । और पट्टरानी लीलादेवी ने दूती भेजकर स्वयम् उन्हें आमंत्रित किया था। इस प्रकार इन चारों योग्यता के आधारों को देखकर उन गुणा धारों में कौन छोटा है, कौन बड़ा-यह राजा विचार करने लगा। सब में दक्षिणता रखनेवाला 'दक्षिणनायक' (तुल्यानुरागी) राजराजेश्वर श्री भोज समान भाव से दो-तीन घड़ी तक विचार करके भी किसी विशिष्टता की अवधारणा न करने के कारण सो गया । और सुबह उठकर दैनिक कार्य करके सभा में पहुंचा।

 तत्र च सिंहासनमलकुर्वाणः श्रीभोजः सकल विद्वत्कविमण्डलमण्डनं कालिदासमालोक्य 'सकवे, इमां व्यतरोनतुरीयचरणां समस्यां शृणु।' इत्युक्त्वा पठति---'अप्रतिपत्तिमूढमनसा द्वित्राः स्थिता नाडिकाः। इति पठित्वा राजा. कालिदासमाह--'सकवे, एतत्समस्यापूरणं कुरु' इति ।