पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/४२१

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१५१० ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते चन्द्रमध्यमगतिसमं तदा - . भूव्याकरण (रख्या-भूव्या) स्वीकृतं च- भूभा १५ चंग बिम्बकला, अत आचार्योक्तमुपपन्नमिति ॥११॥ अब प्रकारान्तर से भू भामान को कहते हैं । हि. भा-भ्यास और चन्द्रगति के घात में भूव्यास और रविव्यास के अन्तर से गुणित रविगति को घटाकर पन्द्रह से गुणित चन्द्रमध्यम गति से भाग देने से लब्ध भूभा- व्यास होता है इति ॥११॥ उपपत्ति । चक त्रि भूव्या त्रि (रख्याभूव्या) पूर्वश्लोक से भूभाबिम्बकलाः = -– = त्रि. भूव्या३४२ - त्रि (ख्या- भूव्या) L =२ चन्द्रपरमलम्बनकला चक २ चग ~:चन्द्रपरमलम्बनकला, अतः, - - १५ १५ ( - भ भा = • त्रिभूव्या (रव्या–भूव्या): बंग , रक.भूध्या त्रि-भृघ्या (ब्या-भूव्या), – २ च ग -त्रि-भूव्याईX२ (रख्या-भूव्या) रक-भूव्या १५ रक-भूव्या ८ २ यंग - २ रविपरमलम्बन (ब्या-भूव्या) = _२ च ग १५ १५ २ रण - भूव्या- (ख्याभूव्या) समच्छेद से २ च ग. २रग (रव्या- भूव्या) १५x भूव्या १५४ म व्या च ग. भव्या-रग (रव्या-- व्या) यहां आचार्यों ने स्वल्पान्तर से चन्द्र- १५४ व्याई मध्यमगति के बराबर भूव्यासार्थ को स्वीकार किया है । तत्र ण गव्यार्ग रष्या—भ.च्या .सू- () =भभाविस्वकला, इससे आचायक्त उपपन्न हुआ १५ चग इति ॥११॥ , इदानोमध्यायोपसंहारमाह । योऽधिकमासावमरात्रसम्भवज्ञः स वेत्ति मानानि । आर्याद्बशभिरयं मानाप्यायत्रयोविंशः ॥१२।