पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/३६९

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१४५८ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते अत्रोपपत्तिः । प्रग=यष्टि:= द्विर । प्र=प्रथमवेधस्थानम् । द्वि=द्वितीयवेधस्थानम् प्रथमवेघ स्थानेशलाका= गन=श। द्वितीयवेध स्थाने शलाका ( =रम=श प्रद्वि=अपसृतिः । के कप्र=भूः । कद्वि=*=+अपति । तदा प्रकप्र, नगप्र त्रिभुजयो सजातीयत्वादनुपातः शये . =अक=गृहाद्यौ च्च्यम् । तथा प्रकटि, मरद्वि त्रिभुजयोः साजात्यादनुपातेन = 1। शश्न यष्टि _ श' (+अपति) -गृहाद्यौच्यख। अतः-शथळे . = श (+अपति) यष्टि यष्टि पक्षौ 'यष्टि गुणितौ तदा श.भू=श (+अपति) =g.भू-+श.अपसति, समशोधनेन श.भ--श.भ=भ शश) = श अपचति पक्षौ श~शं भक्तौ तदा अपति श-अपचति शअपचति = । एवं =x, एतेनोपपन्नमाचार्योक्तमिति ॥३२॥ श–२ श-श अब यष्टि से ग्रहादि की ऊंचाई का आनयन कहते हैं। हि. भा.-एक इष्ट प्रमाण की यष्टि ग्रहण कर उसके एक अग्न में उस के ऊपर लम्बरूप अङ्गुलादि से अङ्कित एक विपुल (मोटी) शलाका खूब दृढ़ता से बाँधनी चाहिये। यष्टि के अन्य अग्र स्थित दृष्टि से समधरातलस्थित ग्रहादि की ऊंचाई को वेध करना शलाका प्रमाण को भी जान कर प्रथमवेधस्थान से उसी सरल रेखा में कुछ दूर जाकर द्वितीय स्थान से भी ग्रहादि की ऊंचाई को वेध करना चाहिये। वहां भी शलाका प्रमाण जान लेना चाहिये । दोनों वेध स्यानों का अन्तर अपमृति कहलाती है । अपसूति को अन्यशलाका से गुणाकर शलाकान्तर से भाग देने से खू (वेध स्थान और ग्रहादि का अन्तर) प्रमाण होता है। भू को अपनी शलाका से गुणाकर यष्टि से भाग देने ये ग्रहादि की ऊंचाई होती है इति ॥३२॥