पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/३४९

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१४३८ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते हुआ । इसके केन्द्र में लम्बरूपयष्टि की छाया उसकी परिधि में जहां लगती है वह बिन्दु सूर्यकेन्द्र बिन्दु से षड्भान्तर (छः राशि अन्तर) पर होता है । सूयोदयकाल में सूर्याधिष्ठित अंश (जिस अंश में सूर्य है) से षडभान्तर (छः राशि अन्तर) पर पश्चिम बिन्दु ही में अवलम्ब की छाया यन्त्र परिधि में लगती है, उसके बाद ज्यों-ज्यों सूर्यं ऊपर जाते हैं त्यों त्यों लम्ब की छाया पश्चिम बिन्दु से नीचे जाती है । वही लम्ब से त्यक्त अ श है, वह सूर्याधिष्ठित अंश से लेकर (आरम्भकर) उन्नतांश ही है । यह यन्त्र घटिकाओं से अङ्कित है । इसलिये यन्त्रमुक्त (यन्त्र से त्यक्त) घटी सूर्योदय से गत घटी है । इस चक्रयन्त्र का श्राधा वृत्तार्ध रूप चाप यन्त्र होता है । उस चाप यन्त्र में भी वृत्त की अधंकारिणी व्यास रेखा के मध्य में सूक्ष्म छिद्र और तगत लम्ब चक्र यत्र ही की तरह देना चाहिये चक्र यत्र के । अनुसारीही इस चाप यन्त्र में भी वृत्तार्घ ही से उन्नतांश और उन्नतांश और उन्नत घटी का ज्ञान करते हैं । शिष्यधीवृद्धिद तन्त्र में वृत्तं कृत्वा फलकं षड्बर्गाङ्क तथा च षष्टधकम्’ इत्यादि विज्ञान में लिखित, लल्लाचार्योक्त श्लोकों के आशय को श्रीपति ने श्लोकान्तर भाष्य से कहा है । सिद्धान्तशिरोमणि के गोलाध्याय में ‘चक्र चक्रांशाक परिधौ श्लथश्रृंखला चिकाधारम्’ इत्यादि श्लोकों से भास्कराचार्य ने भी चक्रयन्त्र उसी तरह कहा है इति ॥१८॥ इदानीं यष्टयाशङीबाद्याह यष्टिस्तिर्यग्धार्या नष्टच्छायावलम्बकः शङ्कुः । दृग्ज्यान्तरममुपातात् स्वहोरात्रार्धमग्ना च ।१e सु. भा.–क्षितिजवृत्तकेन्द्रगता यष्टिस्तथा धार्या यथा सा नष्टच्छाया स्यात् । एवं यष्टिव्यासार्धभवगोले यष्टघग्रे रविकेन्द्र भवति तस्मात् क्षितिजोपरि योऽवलम्बकः स शङ्कुरैवति । यष्टिमूलाच्छङ्कुमूलपर्यन्तमन्तर दृग्ज्या भवति । अनुपातात् यष्टेरनुपातात् स्वाहोरव्यासाधं द्यज्या तथाऽग्रा च साध्या । उदयकाले रविकेन्द्रोपरि यष्टयनुपातेनार्थाद्यष्ट्यग्रप्रपातेन क्षितिजे तत्प्राग् बिन्द्वन्तरमग्नांशाः ततः पलकर्णेन द्वादशकोटिस्तदाऽग्रया कि जाता क्रान्तिज्या। तत्कोटिज्या युज्या प्रसिद्धेव । ‘यष्टयग्राल्लम्बोना ज्ञेया दृग्ज्या मॅकेन्द्रयोर्मध्ये' इति तथा उदयेऽस्ते यष्टयग्रप्राच्यपरा मध्यमग्रा स्यात् --इति च भास्करोक्त चिन्त्यम् ॥ १६ ॥ वि.भा.-क्षितिजवृत्तकेन्द्रगता यष्टिस्तथा धार्या यथा सा नष्टद्युतिर्भवेत् । एवं यष्टिव्यासाधत्पन्नगोले यष्ट्यग्र रविर्भवति, रविकेन्द्रात् क्षितिज धरातलो परि योऽवलम्बकः सशङ्कुर्भवति । यष्टिमूलाच्छङ,कुसूल पर्यन्तं दृग्ज्या भवति । यष्टेरनुपातात् स्वाहोरात्रार्थं (द्युज्या) अग्रा च साध्या। यष्टयग्रपूर्वापर रेखयो रन्तरं त्रिज्यावृत्ते ज्यार्धवत् स्थितम् ।साग्रा ज्ञेया। ततः पलकर्णेन द्वादशकोटि स्तदाऽग्रया कि जाता क्रान्तिज्या, ततः त्रि’ –क्रांज्या'=द्युज्या, “थट्याग्राल्ल