पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/३१

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( २२ ) आग्नेये नैऋत्ये वेष्टदिने संस्थितस्य योऽर्कस्य । शङ्कुच्छाये कथयति वर्षादपि वेत्ति सूर्य सः ।। रक्खा हुआ है । इसका उत्तर कोणशङ्कु के आनयन से स्फुट है । ध्यान ग्रहोपदेशाध्याय-मूल ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त का अंग नहीं है। ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त तो चौबीसवें (संज्ञाध्याय) अध्याय पर समाप्त हो जाता ध्यानग्रहोपदेशाध्यात्र है। ध्यान ग्रहोपदेशाध्याय भी ब्रह्मगुप्त की ही एक कृति हैं । अतः परिशिष्ट के रूप इसे यहाँ संलग्न कर दिया गया है। इसके चैत्रादि में मासगणानयन, चैत्रादि में दिनादिक, तिथिाध्रुवसाधन, इद्रमासादि में रवि के आनयन प्रकार, प्रतिमास में चन्द्रकेन्द्र, तिधि घ्रवक्षेप के आनयन का प्रतिपादन है । प्रतिदिन चालन, चन्द्रसाधन, औदयिक रविसाधन, ज्याखण्ड तथा केन्द्रज्या साधन का वर्णन है त्रिंशत्सनवरसेन्दुजिनतिधिविषयागृहार्धचापानाम् । अर्धज्याखण्डानि ज्याभुक्तैक्यं स गतभोग्यखण्डकान्तर दलविकलवधाच्छतैर्नवभिराप्तैः । तद्युतिदलं युतोन भोग्यादूनाधिकं भोग्यम् । यह प्राचार्योक्त भोग्यखण्ड स्पष्टीकरण है। भास्कराचार्य ने इसी को सिद्धान्तशिरो मणि के स्पष्टाधिकार में “यातैष्ययोः खण्डकयोविशेषः शेषांशनिघ्नः' इत्यादि द्वारा लिग्वा है । भास्कराचार्य ने १२० त्रिज्या ग्रहण की हैं । यहाँ आचार्य ब्रह्मगुप्त ने १५० त्रिज्या ग्रहण को हैं । यहाँ यह बात बड़ी चित्रित्र लगती है कि प्राचार्योक्त विषयों को ही सिद्धान्त शेखर में श्रीपति ने सर्वत्र श्लोकान्तरों में लिखा है, परन्तु पता नहीं क्यों उन्होंने आचार्योक्त इस अपूर्व भोग्य खण्ड स्पष्टीकरण की चर्चा तक नहीं की । चन्द्र में भुजफल संस्कार, तिथि फलसंस्कार आदि सभी विषय विलक्षण है। प्राचार्य ने इस अध्याय में जो विषय लिख दिये हैं, सूर्यसिद्धान्त-सिद्धान्तशेखर-तथा सिद्धान्त शिरोमणि में वे नही हैं । ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त में जिन आचार्यो के नाम आये हैं। उनके सम्बन्ध में कुछ विचार करते हैं। सव सिद्धान्तों में आदिम या सबसे प्राचीन सिद्धान्त ब्रह्मसिद्धान्त ही है । इसी को लोग पितामह सिद्धान्त के नाम से भी कहते हैं । पञ्चसिद्धान्त में वराहमिहिर ने का बारहवें अध्याय को जिसमें केवल पांच आर्याएँ हैं, पैतामह सिद्धान्त के नाम से पुकारते हैं, रविशशिनोः पञ्चयुग वर्षाणि पितामहोपदिष्टानि । अधिमासस्त्रिशदुभिर्मासैरवमस्त्रिषष्टयाऽलुम् ॥१॥