पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/१९४

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उदाहरणानि (शेषर्योगं ) स्थानद्वये स्थाप्यमेकत्रान्तरेण युतमन्यत्र हीनं कार्य द्वाभ्यां भक्तं तदा शेषे भवेतामित्युत्तरम् ।

                                         अत्रोपपत्तिः

कल्पयते अंशशेषमानम्=य, कलाशेषमानम्=र, अनयोर्योगः=य+र=यो, तयोरेवान्तरम्=य‌-र= शृं =(य+र) + (यो‌-शृं) = य+र+य = २ य यो-शृं/ २ =य तथा यो - शृं= (य+र) - (य-र) = य+र-य+र = २ यो-श्र्ं/२=र, अत आचार्याक्तमुपपत्रभ्र् ॥१६॥


अब पुनः प्रश्नान्तर और उसके उत्तर को कहते हैं ।


हि भा - अंशशेष और कलाशेष का योग तथा उन्हीं दोनों शेषों का अन्तर जान कर वे दोनों शेष क्या हैं यह प्रश्न है । दोनों शेषों के योग को दो स्थानों में रख कर एक स्थान में अन्तर को जोड कर दूसरे स्थान में अन्तर को घटाकर आया करने से दोनों शेषों के मान होते हैं, यह उत्तर है ।


"योगोऽन्तरयुतहीनो द्विहत" इत्यादि से पहले कह चुके हैं, यहां भी 'ऐक्ध द्विधाऽन्तराधिकहीनं' इत्यादि से उसी संक्रमख की प्रक्रिया का पिष्टपेषख करते हैं, सिद्धान्तशेखर में ' योगोऽन्तरेखोनयुतो द्विभक्तः कर्मोदितं संक्रमखाख्यमेतत्' इससे धीपति तथा लीलावती में ' योगोऽन्तरेखोनयुतोऽधितस्तौ राशी स्मृतं संक्रमखाख्यमेतत्' इससे भास्कराचार्य ने भी आचार्योक्त संक्रमख कर्म के सद्दश ही संक्रमख कर्म कहा है इति ॥६॥


                                       इदानीं पुनः प्रश्नान्तरं तदुत्तरं चाह । 


                       तद्दर्गान्तरमाद्ये तदन्तरं चान्तरोद्धृतयुतोनमृ ।
                       वर्गान्तरं विभक्तं द्वाभ्यां शेषे ततो द्यु गखः ॥७॥


पु भोः - आद्येऽनन्तरोक्ते प्रश्ने यदि तयोः शेषयोवंर्गान्तरं तथा तयोरन्तरं