पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/१५

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( ६ ) न्तरों से श्रीपति ने कह दिया है । सारांश यह है कि श्रीपति ने दोनों (ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त और शिष्यधीवृद्धिद) ग्रन्थों . का परिशीलन करने के पश्चात् ही सिद्धान्तशेखर की रचना की । ब्रह्मगुप्त ने एक बहुत विलक्षण विषय को अपनी रचना में स्थान दिया है । यह है ‘नतकर्म' । मन्दफल शीघ्रफल भुजान्तरादि संस्कार करने से जो स्पष्टग्रह आते हैं वे स्वगोलीय (ग्रहगोलीय) स्पष्ट ग्रह होते हैं । उन स्वगोलीय स्पष्ट ब्रह्मगुप्त का ग्रहों को हम लोग जहां देखते हैं वे हम लोगों के लिए स्पष्ट ग्रह ‘नतकर्म' होते हैं । स्वगोलीय स्पष्टग्रह में जितना संस्कार करने से हम लोगों के स्पष्टग्रह होते हैं उसी संस्कार का नाम ‘नतकर्म' है । ब्रह्मगुप्त से पूर्व किसी भी अन्य प्राचीनचार्य ने कुछ भी नहीं लिखा । नतकर्म साधन की बात तो दूर रही, उसके नाम तक का भी किसी ने उल्लेख नहीं किया । भास्कराचार्य ने सिद्धान्तशिरोमणि (गणिताध्याय) के स्पष्टाधिकार में इस नतकर्म के साधन का प्रकार लिखा है । ‘मुहुः स्फुटाऽतो ग्रहणे रवीन्द्वोस्तिथिस्त्विदं जिष्णुसुतो जगाद’ भास्कर का इस उक्ति से स्पष्ट ज्ञात होता है-कि इस ‘नतकर्म' के आविष्कत्त ब्रह्मगुप्त ही हैं । सिद्धान्त शिरोमणि (गणिताध्याय) के स्पष्टांधिकार में भास्कराचार्य ने ‘भोग्धखण्डस्पष्टीकरण' में जो लिखा है उसका मूल भी ब्रह्मगुप्तकृत ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के ध्यान ग्रहोपदेशाध्याय में ही है । और प्राचार्यो ने इस विषय में कुछ नहीं लिखा है। सिद्धान्त तत्व विवेक में कमला कर ने भास्करोक्त भोग्यखण्ड स्पष्टीकरण प्रकार का खण्डन किया है। वस्तुत: यह खण्डन कमलाकर का दुराग्रह ही है। अत: यह खण्डन ठीक नहीं है। ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त के त्रिप्रश्नाधिकार में दिक्साधन में पूर्वापरयोविन्दू तुल्यच्छायाग्रयोर्दिगपराद्यः । पूर्वान्यः क्रान्तिवशात् तन्मध्याच्छङ्कुतलमितरे ।। यहाँ क्रान्तिवश से दिक्साधन में कैसे भेद उत्पन्न होता है इसके लिए चतुर्वेदाचार्य ने कर्णवृत्ताग्रान्तर का जो साधन किया है उसी को ‘छाया निर्गमन प्रवेश समयार्कक्रान्ति जीवान्तरं’ आदि द्वारा श्रीपति ने कहा है । उसके पश्चात् ‘तत्कालापमजीवयोस्तु विवरात् इत्यादि से सिद्धान्तशिरोमणि में भास्काचार्य ने कहा है । सूर्यसिद्धान्त आदि प्राचीन ग्रन्थों म् इस विषय का उल्लख नहा है । ‘मन्दफलानयन' के लिए मन्दकर्णानुपात ही आवश्यक साधन है। यद्यपि इस विषय में भास्कराचार्य ने अपना कुछ भी मत व्यक्त नहीं किया है, तथापि चन्द्रग्रहणाधिकार में स्फुट रवि चन्द्रकर्णसाधन में ‘मन्दश्रुतिद्रक् श्रुतिवत्प्रसाध्या' इत्यादि से ब्रह्मगुप्त ही के मत को स्वीकार किया है। यह भी ब्रह्मगुप्त की उक्ति की ही विलक्षणता है ।