पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/१४९

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१२४० ब्राह्मस्फ़्उटसिद्धान्ते

वा शोधक संज्ञक है । उसको भी श्रधोSधः दो स्थानों में स्थापन करना । इस तरह दो पंक्तियों में कनिष्ठ ज्येष्ठ और क्षेप का स्थापन हुआ । इष्टवर्ग को जिस गुरगक से गुरगा किया गया है उसका नाम प्रकृति है । कनिष्ठ द्वय के घात को प्रकृति से गुरगा कर ज्येष्ठद्वय घात को जोडने से अन्य ज्येष्ठ होता है कनिष्ठ और ज्येष्ठ के वज्राभ्यास क योग अन्य कनिष्ठ होत है वहां क्षेपद्वय का घात क्षेप होता है । एवं प्रक्षेप (शोधक) के ॠरग क्षेप में तुल्य भावना से जो कनिष्ठ और ज्येष्ठ होते हैं उन्हें प्रक्षेप से भाग देने से रूप क्षेप में कनिष्ठ और ज्येष्ठ होते हैं ॥


                                उपपत्ति ।                                                  

प्र =प्रकृति, क् =कनिष्ठ, ज्ये =ज्येष्ठ, क्षे =क्षेप तब सुत्रानुसार प्र.क+क्षे=ज्ये अतः ज्ये-प्र. क=क्षे, एवं ज्ये-प्र. क=क्षे, इन दोनों के घात करने से क्षे. क्षे=ज्ये. ज्ये-ज्ये. प्र. क-ज्ये.प्र.क+प्र.क. क. इसमें २ प्र.क.क. ज्ये-ज्ये इसको धन ॠरग और ॠरग धन करने से ज्ये. ज्ये+-२ प्र.क.क.ज्ये.ज्ये.+प्र.क.क+२ प्र.क.क.ज्ये.ज्ये.-ज्ये. प्र.क-ज्ये. प्र.क. =(ज्ये.ज्ये+-प्र.क. क.) -प्र{(ज्ये.क+-ज्ये.क)} पक्षान्तर से प्र {(ज्ये.क+-ज्ये.क)} + क्षे.क्षे=(ज्ये.ज्ये+-प्र.क.क) अतः क्षेपचात तुल्य क्षेप में ज्ये. क+-ज्ये. क यह कनिष्ठ होता है और ज्ये. ज्ये+-प्र.क.क यह ज्येष्ठ होता है । इससे भ्राचायोक्त भावना उपपन्न होती है ॥ सिद्धान्त शेखर में 'कृतेर्गुरगओ यः प्रकृतिर्हि प्रोक्ता क्षिप्तिस्तथैवरर्गघनात्मिका स्यात' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित, श्रीपयुक्त आचार्योक्त अनुरूप ही है; भावना विधि 'वज्राभ्यासौ ह्रस्व्ज्येष्ठकयोस्तद्युतिर्भवेद्धस्वम्' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित, भावना आचार्योक्त भावना के अनुरूप ही है । बीजगरिगत में 'इष्टं ह्रस्वं तस्य वर्गः प्रकृत्या क्षुण्रगो युक्तो वर्गितो वा स येन' इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित पद्यों से भास्कराचार्य ने भी आचर्योक्त के अनुरूप ही कहा है ॥ ६४-६५ ॥


                             इदानीं विशेषमाह ।
                   रूपप्रक्षेपपदे पृथगिषृक्षेप्यशोध्यमूलाभ्याम ।
                   कृत्वाSSन्त्याद्यपदे ये प्रक्षेपे शोधनेवेष्टे  ॥६६॥
    सु.भा. - रूपप्रक्षेपे ये पदे आद्यान्त्यपदे ते पृथक् स्थाप्ये । तत इष्टक्षेपे वेष्टशोधके ये मूले ताभ्यां भवनयाSन्ये अन्त्यद्यपदे ज्येष्ठकनिषेठे कृत्वा ते इष्ठे प्रक्षेपे वेष्टे शोधनेSन्ये अन्त्याद्यपदे ज्ञेये इति   ॥६६॥