पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/१३

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‘कृती जयति जिष्णुजो गणकचक्रचूडामणिः ।' इस उक्ति द्वारा भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्त शिरोमणि के गणिताध्याय के प्रारम्भ में आचार्य ब्रह्मगुप्त को अभिवादन किया । उसके पश्चात् अनेक स्थानों पर ब्रह्मगुप्त के मत का उल्लेख करते हुए भास्करा चार्य ने लिखा यथाऽत्र ग्रन्थे ब्रह्मगुप्त स्वीकृतागमोऽङ्गीकृतः । इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भास्कराचार्य ने अपने ग्रन्थ में ब्रह्मगुप्त का ही अनुकरण किया । ब्रह्मगुप्त को अयन चलन की उपलब्धि नहीं हुई, यह बात ‘ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त' से समझी जाती है। अत एव ब्रह्मगुप्तकृत अयन चलोपलब्धि का खण्डन देता जाता है। तन्त्रपरीक्षाध्याय में ब्रह्मगुप्त ने कहा है। परमाल्पा मिथुनान्ते द्युरात्रिनाडयोऽर्क गतिवशादृतवः । नायनयुगमयनवशात् स्थिरमयनद्वितयमपि तस्मात् ।। वराह मिहिराचार्य अयनचलन के विषय में सन्दिहान थे । इसीलिए उन्होंने ‘नूनं कदाचिदासीद्येनोक्तं पूर्वशास्त्रेषु ' कहा है। उस समय अश्विन्यादि में क्रान्तिपात था इसलिए अश्विन्यादि से नक्षत्रों की गणना प्रवृत्त हुई। ब्रह्मगुप्त के पश्चात् आज तक गणना की यही प्रक्रिया प्रचलित है। क्रान्तिपात पश्चिम दिशा में प्राय: ६५ वर्ष में एक ओश चलता है । अत: उसका ज्ञान अल्पसमय में असम्भव प्राय है । इसीलिए तो ब्रह्मगुप्त भी अयनचलन की उपलब्धि नहीं कर सके । आर्यभट का विरोधीं होकर भी ब्रह्मगुप्त ने ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त की रचना की । ३७ वर्ष की अवस्था में ब्रह्मगुप्त ने ' ‘खण्डखाद्यक' नाम के कारण ग्रन्थ का खण्डखाद्यक की रचना प्रणयन किया । उसके प्रारंभ में ही ग्रह्मगुप्त ने प्रणिपत्य महादेवं जगदुत्पत्ति स्थितिप्रलयहेतुम् । वक्ष्यामि खण्डखाद्यकमाचायांयभटतुल्यफलम् ।। प्रायेणार्यभटेन व्यवहारः प्रतिदिनं यतोऽशक्यः । उद्वाहजातकादिषु तत्समफल लघुतरोक्तिरतः ।। यह उनके ग्रन्थ की पर्यालोचन से समझा जाता है कि सर्वत्र मनुष्यों के व्यवहारों में प्रचलित आर्यभट मत का निराकरण करना अत्यन्त कठिन था । इसलिए आर्यभट मतानु सार व्यवहार करते हुए मनुष्यों के उपकारार्थ व्यावहारिक ‘खण्डखाद्यक’ नामक करण ग्रन्थ की रचना ब्रह्मगुप्त ने की । जिस प्रकार उपलब्ध प्राचीन ज्यौतिषसिद्धान्त ग्रन्थों में ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त एक आदर्श ग्रन्थ माना जाता है उसी पकार सब करणग्रन्थों में सर्व प्रथम आदर्श आज से तेरह सौ वर्ष पूर्व लिखित यही ‘खण्डखाद्यक’ है।