रुधिरमयम् )चर्म, हाड़, नाड़ी, मांस, आंतें, मज्जा और रुधिर इन सात धातुओं की बाहुल्यता वाला अतएव (अतिस्वल्पम् ) अति तुच्छ (आध्यामयाढ्यम् ) मन के और शरीरके दुःखों के सहित अर्थात् कामादि भंग जन्य अन्तर मानसी पीड़ा वाला और ज्वर रेचन आदिक शरीरिक दुःखों वाला ( प्रारणापाये ) तथा प्राण के वियोग होने पर अर्थात् मरण होने पर ( मृदादि प्रतिमम् ) मृत्तिका पिंड आदिकों के समान ( अपिच) तथा (विट् कीट भस्माशेषम् ) मृत्युके अनन्तर भक्षण, बहुकाल स्थिति तथा दाह इनसे मल, कृमि तथा भस्म रूप से अवशिष्यमारण जो यह शरीर है, ( मूढ़ ) हे मूर्ख (तम् ) ऐसे नीच और निंदित ( देहम् ) शरीर को ( कस्मात् ) किस कारण से ( त्वम् ) तू ( श्रहं इति मनुषे ) अपना आत्मा मानता है, इसमें ग्लानि क्यों नहीं करता ? और तू ( केन वंचितोसि ) किस पापात्मा ठग द्वारा ठगा गया है ॥३२॥
अब इन्द्रियात्मत्व का खंडन करते हैं-
खानामात्मत्ववादे प्रति नियत गतौ स्वामि
नानात्व दोषाद देहोन्माथ प्रसंगः समुदित
त्रिषये त्वन्धमूकामियेरन् | उक्तिदृष्ट श्रुतानाम-
पिच न घटते नापि संघो निरूप्यः स्वप्न दृष्टेव
न स्याच्छयन मरणयोर्निविशेषाद्भयं स्यात् ॥३३॥
इन्द्रियां आत्मा है ऐसा मानने में इन्द्रियां सब दिशाओं में विषय ग्रहण के हेतु प्रवृत्त होगी और देह का
५ स्वा. सि.
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प्रकरण १ श्लो० ३३