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पृष्ठम्:स्वराज्य सिद्धि.djvu/५५

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प्रकरण १ श्लो० १५

प्रकारता भी कैसे हो सकती है ? भाव यह है कार्य के अभाव को वस्तु रूप से स्वीकार करने से उनसे कारणादिकों के किंचित् भी संबंध का सत्व होने से विशेष का निरूपण करना ही कठिन है । (इति) इस उक्त प्रकार से (बुद्ध बंधोः ) कुत्सित बुद्ध का ( प्रलापः ) विरुद्ध अनेक वाद ( वितथः ) यथार्थ नहीं है ॥२४॥
 स्वप्न की तरह बाह्य अर्थ के विना भी प्रमाता प्रमाण प्रमेय प्रमिति रूप सर्व व्यवहार सर्वाकार विज्ञान से ही सिद्ध होजाता है, इसलिये बाकी उत्पत्ति अनुपपन्न है इस विज्ञानैक वादी बुद्ध के मत का खंडन अब किया जाता है-

नापोद्यं मानसिद्धं कथमिव विविधं ज्ञानमर्था- पलापे बाधोऽर्थानां न दृष्टो बहिरिति च पदं न प्रसिद्धार्थमृच्छेत् । वेद्या विज्ञान भेदाः कथ मथ विविधावासना वा कुतः स्युः किंच प्रागुक्त दोषाः चणिक त्रिहितस्तेन विज्ञान वादः ॥२५॥
 बाह्यपदार्थ प्रमाण ने सिद्ध नहीं है ऐसा नहीं कहना चाहिये और बाहर के पदार्थ का अंगीकार न करने से भिन्न २ ज्ञान कैसे होगा ? जाग्रत पदार्थ का बाव देखा नहीं है ? बाहर यह किसी अर्थ की प्राप्ति न करेगा,फिर विज्ञान का भेद कैसे जाना जा सकता है ? अनेक प्रकार की वासना भी कैसे होगी ? तथा चणिक विज्ञान