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पृष्ठम्:स्वराज्य सिद्धि.djvu/५३

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प्रकरण १ श्लो० २४

( कियताम् ) किन स्कंधों को भोग की (भोक्त ता) कर्तृता है ?अहंकार विज्ञान धारास्कंध को कटता है यह भी संभव नहीं है, क्योंकि ( धारापि का ) धारा भी क्या है इस तरह पूछने पर क्षणिक विज्ञान का नाम ही धारा है यही कहना होगा, तब क्षणिक अर्थात् अन्य क्षरण में न रहने वाला होने से सो विज्ञान धारा स्कंधकर्ता भोक्ता नहीं हो सकता । इस प्रकार कर्ता भोक्ता असिद्धि होने पर ( भोगमोक्षौ कस्य स्ताम् ) भोग और मोक्ष किसको होंगे ? अर्थात् किसी भोग मोक्ष की इच्छा कर्ता के स्थायीभाव के अभाव से किसी को भी नहीं होंगी। तब ऐसे होने पर हे जड़ तू ( वद ) कह (ते) तेरे ( दर्शनम् ) शास्त्र को ( केन वा ) किस फल के लिये वा किस प्रकार से ( सफलम् )सफलता है अर्थात् तेरा शास्त्र ही निष्फल है ॥२३॥
ना विद्यादि प्रवृत्तेर्द्विविध समुदयस्ते यदेकैक सन्नानश्यन्नुत्वा दनेन प्रभवति किमरे हेत्वसंबंधि कार्यम् । तच्चेन्निर्हेतुकं स्यात् करण विफलता स्व प्रतिज्ञाविरोधौ त्रैविध्यं चाप्यभावे कथमिति वितथो बुद्धबंधोः प्रलापः ॥२४॥
 भोक्ता भोग्य समुदाय अविद्या की प्रवृत्ति से नहीं है, क्योंकि यह प्रतिक्षण में नष्ट होता है, प्रतिक्षण में नष्ट होने से अन्यक्षण की उत्पत्ति के हेतु कैसे हो सकते हैं ? नाश होता हुआ उत्पत्ति करने में समर्थ नहीं होता । हे वादी, क्या कार्य हेतु के विना ही होता है ? और निर्हेतुक होता हो