पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/२१

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भोजप्रवन्धः


 तुम्हारे निमित्त जो नियम और उपवास मैंने किये, वे सब निष्फल हो गये । दसों दिशामुख सूने हैं । पुत्र, सब जानने वाले, सर्वशक्तिमान ईश्वर ने सव संपत्ति नष्ट कर दो। बेटे' सहसा सिर कटे हुए इस दासियों के समूह को देखो,'-ऐसा कह कर वह वरती पर गिर पड़ी।

 ततः प्रदीन्ते वैश्वानरे समुद्र तधूमस्तोमेनैव मलीमसे नभसि पाप- त्रासादिव पश्चिमपयोनिधौ मरने मार्तण्डमण्डले महामायाभवनमासाद्य. प्राह भोज वत्सराजः-'कुमार, भूत्यानां देवत, ज्योतिःशास्त्रविशारदेन केनचिद् ब्राह्मणेन तव राज्यप्राताबुदीरितायां राज्ञा भवद्वधो व्या[१] उक्त इत्यर्थः।

  1. दिष्टः' इति।  तत्पश्चात् आग जलने से उत्पन्न धुएँ की धुंध से आकाश के मलिन हो जाने पर, पाप के डर से जैसे सूर्यमंडल के पश्चिम समुद्र में डूब जाने पर महामाया के मंदिर में पहुंच कर वत्सराज भोज से बोला-'कुमार, सेवकों के देवता, ज्योतिप विद्या में निपुण किसी ब्राह्मण के द्वारा आपकी राज्य- प्राप्ति की घोपणा की जाने पर राजाने आपके वध की आज्ञा दी है।' भोजः प्राह-

    'रामे प्रव्रजनं बलेनियमनं पाण्डोः सुतानां वनं
    वृष्णीनां निधनं नलस्य नृपते राज्यात्परिभ्र शनम् ।
    कारागारनिषेवणं च वरणं सञ्चिन्त्य लङ्केश्वरे
    सवः कार वशेन नश्यति नरः को वा परित्रायते' ।। २८।।

     भोज ने कहा-राम का देश से निर्वासन, बलि का बंधन, पांडपुत्रों का वनवास, यादवों की मृत्यु, राजा नल का राज्य से हट जाना, वंदीगृह में निवास ( 'कारागार' के स्थान में 'पाकागार' भी प्राप्त होता है-अर्थ, रसोइये का कार्य करना) और पुनः स्वयंवर में दमयंती की प्राप्ति, ('वरणं. के स्थान में 'मरणं' भी है-अर्थ मृत्यु अर्थात् लंका के राजा रावण की मृत्यु) और लंकाधीश रावण की मृत्यु विचार कर निश्चय होता है कि प्रत्येक मनुष्य काल के वश होकर नाण को प्राप्त होता है, कौन वाण पाता है ?