पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१६२

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भोजप्रबन्धः


 गरज पड़े में जल में उत्पन्न होती ध्वनि को सुनकर यह मान लिया कि रा द्वारा पकड़ कर लिये जाते (इस प्रकार मालिगित ) इस घटको न बनि रति-समय संदरी के द्वारा किये जाते कूजन शब्द के समान है और उना में जाकर कालिदास ने कहा-'कूजित रति अजित है।'..

कविराह-
"विदग्धे सुमुखे रक्त नितन्त्रोपरि संस्थिते ।
कामिन्याश्निष्टलगले कूजितं रतिकृजितम् ।। ३०३ ।।
तदा तुटो राजा प्रत्यक्षरलयं ददौ, ननाम च ।

 कवि ने कहा-खूब पके, सुदर मुंहबाले, लाल, कमर पर रखे हुए; गले लगे कामिनि के घर का यह कूजित रति कूजित है ।।

 तब संतुष्ट होकर राजा ने प्रत्यक्षर लक्ष मुद्राएँ दी और प्रणाम किया ।

 एकता नर्मदायां महालदे जालकैरेकः शिलाखण्ड ईवन शिताक्षर: अधिः । परिचिन्तितम्-'इमत्र लिखितमिव किञ्चिद्धाति । नूनमिदं राजनिकटं नेयम्' इति बुया भोजससि समानीतम् ।

 एक वार नर्मदा की गहरी जलराशि में जाल डालने वाले मछेरों ने पिने-निटे अक्षरों वाला एक शिला का खंड देखा। उन्होंने सोचा-यह इस पर कुछ लिखा-सा प्रतीत होता है। निश्चय ही इसे राजा के पास ले जाना उचित है ।' ऐसा निश्चय करके वह शिलाखंड भोज की सभा में ले आये।

 तवाकी भोलाप्राह-'पूर्व भगवताहनूमता श्रीमद्रामायणं कृतम्। तदन हदे प्रक्षेपितमिति श्रुतमस्ति । ततः किमिदं लिखितमित्यवश्यं विचार्यमिति लिपिज्ञानं कार्यम् ।

 मछेरों की बात सुनकर भोज ने कहा-'प्राचीन काल में भगवान् हनुमान ने श्रीमद् रामायण की रचना की थी। ऐसा सुना गया है कि उसे उन्होंने यहीं जल राशि में फेंक दिया था। सो यह क्या लिखा है, इस पर अवश्य विचार होना चाहिए और एतदर्थ इसकी लिपि की जानकारी करानी' चाहिए।'