पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/५३

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११४४ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते भुजा भवति । ततश्चन्द्रकेन्द्राद् भुजाग्रतश्च कर्णसंस्थानं ज्ञेयम् । अवशिष्टं पूर्ववदेव बोद्धव्यम् । रवेर्यस्यां दिशि चन्द्रस्तत्र प्रथमंभुजः साधितः । भुजाग्राञ्चन्द्रबिम्बकेन्द्रग्रता रेखाकोटिः । इयमेव कोटिरेखा चन्द्रबिम्बे पूर्वापररेखा । कर्णसूत्रं च चन्द्रबिम्ब परिधौ कोटिसूत्राद् भुजविपरीतदिशि लग्नं तत्स्थानज्ञानार्थ चन्द्रबिम्बाधं भुजः परिणतः कृतस्ततः कर्णसंस्थानज्ञानं सुलभम् ॥७॥ अब प्रकारान्तर से परिलेख को कहते हैं । हेि. भा.-अभीष्ट स्थान में केन्द्र मान कर चद्र बिम्ब को लिखकर दिशाओं का ज्ञान करना चाहिये तब पूर्वश्ङ्गोन्नत्यध्यायोक्त विधि से भुजज्या साधन करना उसका चन्द्र बिम्बार्ध से गुणाकर कण से भाग देने से फल चन्द्र बिम्ब में अन्य दिशा की भुजज्या होती है। तब चन्द्र केन्द्र से और भुजाग्र से कर्ण संस्थान समझना चाहिये। अवशिष्ट विषय पूर्ववत् समझना चाहिये इति । रवि से जिस दिशा में चन्द्र है वहाँ पहले भुज साधित है। भुजाग्र से चन्द्रकेन्द्र गत रेखा कोटि है। कोटि रेखा ही चन्द्रबिम्ब में पूर्वापर रेखा है । कर्णसूत्र चन्द्रबिम्ब परिधि में कोटिसूत्र से भुज विपरीत दिशा में लगता है उस स्थान के ज्ञान के लिये बन्द्र बिम्बार्ध में भुज को परिणत किया गया, तब कर सस्थानज्ञान सुलभ ही है इति ॥७॥ इदानीं फलके परिलेखमाह । प्राच्यपरे विपरीते फलकेऽन्यत् सर्वमुक्तबच्छेषम् । शृङ्गोन्नतिपरिलेखाश्चत्वारः शीतकिरणस्य ॥८॥ सु. भा-फलके गृहणपरिलेखवत् प्राच्यपरे दिशौ विपरीते कायें । अन्य त्सर्वं शेषमवशिष्टं कर्मोक्तवत् कार्यम् । एवं शीतकिरणस्य चन्द्रस्य शृङ्गोन्नति परिलेखाश्चत्वारो भवन्ति । भूमौ प्रकारद्वयं तद्वशतः फलके प्रकारद्वयमिति चत्वार परिलेखप्रकारा भवन्तीति । अत्रोपपत्तिः । ग्रहण परिलेखवत् फलक परिवत्र्याकाशे संस्थाप्य सर्वा दिशो वास्तवा बोध्या इति ।। ८ ।। वि. भा.-फलके पर्वापरे दिशौ विपरीते कायें । अन्यत् सर्वं शेषं कमॉक्तवत्