पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२५४

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गोलाध्यायः १३४५ ग्रहगतियोजनैः किमित्यनुपातेन योजनगतिसम्वन्धिकलाः समायान्ति । तस्मा- द्यस्य अहस्य कक्षा महती तस्य कलाया लघुत्वं, यस्य कक्षा लध्वी तस्य कलाया महत्वं सिध्यति । शनि कक्षाऽन्यग्रहापेक्षया महती, चन्द्रकक्षा च लघ्वी, अतः शनैश्वरस्य कलात्मिका मध्यगतिर्लघुतमा, चन्द्रस्य च महत्तमा भवति, चन्द्रापेक्षया बुधोऽल्पगतिः । बुधापेक्षया शुक्रऽल्पगतिः । शुक्रापेक्षया रविरल्प- गतिरित्यादि । सिद्धान्तशेखरे 'तुल्या गतिर्योजनवत्मनैषां लिप्ता प्रकृत्या मृदुशीघ्र भावःऽप्येवमेवास्ति । सिद्धान्तशिरोमणौ “कक्षाः सर्वा अपि दिविषदां चक्रलिप्ता छूितास्ता वृत्ते लघ्व्यो लघुनि महति स्युमंहत्यश्च लिप्ताः । तस्मादेते शशिज भृगुजादित्यभौमेज्यमन्दा मन्दाक्रान्ता इव शशधराद् भान्ति यान्तः क्रमेण’ इत्यनेन भास्कराचार्येणाप्याचार्योक्तानुरूपमेव कथ्यत इति i१४।। अब शनैदचरादिग्रह कैसे शीघ्रगतिक होते हैं इसके कारक कहते हैं। हि. भा--स्वल्पवृत्त में राश्यंश विभाग लघु होते हैं । यहवृत्त में वे विभाग महान (बड़े) होते हैं । इस कारण से चन्द्र छोटी अपनी कक्षा को अल्प समय में ही पूरा करते हैं अर्याल सम्पूर्ण कक्षा में घूम जाते हैं, और शनैश्चर अपनी बड़ी कक्षा को बहुत समय में पूरा करते हैं अथव सम्पूर्ण कक्षा में घूमते हैं । अतः सब ग्रहों की योजनात्मक गति तुल्य ही होती है, ‘समा गतिस्तु योजनैर्नभः सदां सदा भवेदि' ति भास्करोक्तः सिद्धान्तशेखरेऽपि ‘तुल्यागतिर्योजनवत्मंनेषां श्रीपत्युक्तं सव ग्रह कक्षाओं की कलाओं की असमता के कारण फलादिक गति तुल्य नहीं होती है। अर्थात् अपनी अपनी कक्षा में भ्रमण करते हैं । कक्षा वृत्तों में चक्रकला अङ्कित है यदि ग्रह कक्षा योजन में चक्र कला पाते हैं तो ग्रहगति योजन में क्या इस अनुपात से योजन गति सम्बन्धी कला आती है । इस कारण से जिस ग्रह की कक्षा बड़ी हैं उसकी कला छोटी होती है और जिसकी कक्षा छोटी है उसकी कला बड़ी होती है यह सिद्ध हुआ। शनि कक्षा अब ग्रहों की कक्षाओं से बड़ी है इसलिये शनैश्चर की कलात्मक मध्यमगति सब ग्रहों की गति से छोटी होती है, चन्द्रकक्षा सब ग्रहों की कक्षा से छोटी है इसलिए चन्द्र की कला रमक मध्यमगति सब ग्रहों की मध्यम गति से बड़ी होती है। अतः सबसे शीघ्रगतिक चन्द्र होता है । चन्द्र से अल्पगतिक बुध, बुध से अल्पगतिक शुक्र, शुक्र से अल्पगतिक रवि इत्यादि कक्षाक्रम के अनुसार शीघ्रगतिक और मन्दगतिक होते हैं । सिद्धान्तशेखर में तुल्यागतिर्योज नवमनैषां लिप्ता प्रकृत्या मृदुशीघ्रभाव इससे श्रीपति ने भी शीघ्रगतिक और मन्दगतिक होने का कारण यही कहा है । सिद्धान्त शिरोमणि में ‘कक्षाः सर्वा अपि दिविषदां’ इत्यादि में भास्कराचार्य भी आचार्योंक्त के अनुरूप ही कहा है इति १४॥ इदानीं वृत्तपरिधेयसानयनमाह । यन्मूलं तद्व्यासो मण्डललिप्ताकृतेर्देशहूतायाः । तस्याधं व्यासात्रं योजनकर्णप्रमाणाधीस् ॥१५॥