पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२४२

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गोलाध्यायः १३३३

उपपत्ति।

उत्तरध्रुव देवों का खस्वस्तिक है। दक्षिण ध्रुव दैत्यों का ख स्वस्तिक है । दोनों ध्रुवों को केन्द्र मान कर नवत्यंश से जो वृत्त (नाड़ीवृत्त) होता है वह देव और दैत्यों का क्षितिज वृत्त है । नाड़ीवृत्त और क्रान्तिवृत्त के सम्पातव्दय सायन मेषादि में और सायन तुलादि में रवि दर्शन के बाद पुनः जितने काल में सायन मेषादि और सायन तुलादि में रवि- दर्शन होता है वह एक सायनरविभगण (एक सायन सौरवर्ष) देव और दैत्य का अहोरात्र मान होता है। अतः देवों और दैत्यों का सायन सौरवर्षार्घ (छः महीने) दिन सिद्ध हुआ । परन्तु देवों और दैत्यों का दिन और रात्रि बिलोम से होती है अर्थात् जब मेषादि में उदित रवि को प्रति दिन क्षितिज से ऊपर देव लोग देखते हैं तब देवों से अधः स्थित होने के कारण दैत्य लोग उस रवि को नहीं देखते हैं इसलिये जब देवों का दिन होता है तब दैत्यों की रात्रि होती है। जब देवों की रात्रि होती है तब दैत्यों का दिन होता है। सिद्धान्तशेखर में सकृदुगतो दिनकरः सुरासुरैरपि वत्सरार्धमवलोक्यते स्फुटम्’ वह श्रीपत्युक्त आचार्योक्त के अनुरूप ही है। सूर्य सिद्धान्त में ‘सकृदुद्गतमब्दार्थ पश्यन्त्यर्क सुरासुराः' इस सूर्याश पुरुषोक्ति के अनुरूप ही श्रीपत्युक्त और प्राचार्योक्त है। सिद्धान्तशिरोमणि में ‘रवेश्चक्रभोगोऽर्कवर्ष प्रदिष्टं द्युरात्रं च देवासुराणां तदेव' इस से भास्कराचार्य ने भी प्राचार्थोक्त के अनुरूप ही कहा हैं । इसकी उपपत्ति और दिन रात्रि का स्वरूप सिद्धान्तशिरोमणि में “विषुवद्वत्तं द्युसदां क्षितिजत्वमितं तथा च दैत्यानाम् । उत्तरयाम्यौ क्रमशो मूध्वर्वोध्र्वगतौ' इत्यादि संस्कृतो- पपत्ति में लिखित श्लोक से इस तरह भास्कराचार्य ने कहा है । सांहितिक लोग ‘उत्तरायण देवों का दिन और दक्षिणायन उनकी रात्रि होती है' कहते हैं, इसका खण्डन सिद्धान्तशेखर में दिनप्रवृत्तिर्मरुतामजादौ तुलाघरादौ च निशा प्रवृत्ति:’ इत्यादि से श्रीपति ने किया है। मेषादि में सूर्य के रहने से दिनारम्भ होता है, तुलादि में सूर्य के रहने से रात्र्यारम्भ होता है, जो सांस्कृतिक लोग मकरादि में और कर्कादि में दिन और रात्रि कहते हैं वे लोग इसमें युक्ति कुछ भी नहीं कहते हैं अर्थात् उत्तरायण देवों का दिन होता है और दक्षिणायन रात्रि होती है इसमें कुछ भी युक्ति नहीं कहते हैं । देवता लोग यदि मियुनान्त स्थित सूर्य को देखते हैं तो कर्कराशि में क्रान्ति के समत्व के कारण क्यों नहीं देखते हैं। इस प्रश्न का उत्तर कुछ नहीं है । इसलिये ‘अत्रोपपत्ति न च ते ब्रवन्ति’ यह श्रीपति का कहना ठीक है । श्रीपति रत्नमाला में शिशिरपूर्वमृतुत्रयमुत्तरं’ इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोकों से श्रीपति भी संहितोक्त फलादेश के लिये ‘उत्तरायण और दक्षिणायन ही को दिन और रात्रि कह कर इस ज्यौतिष सिद्धान्त में ‘अत्रोपपत्ति न च ते ब्रवन्ति' से उनका उपहास करते हैं। पितृ दिनोपपत्ति । चन्द्र के ऊध्र्व भाग में पितर बसते हैं। भूकेन्द्र से चन्द्रकेन्द्र गत रेखा पितरों के ऊध्र्वं याम्योत्तरवृत्त में जहां लगती है वह बिन्दु उनका ऊध्र्व खस्वस्तिक है । वही बिन्दु परिणत चन्द्र भी पितृ त्रिज्या गोल में है। ऊध्र्वखस्वस्तिक गत रेखा अधोयाम्योत्तर वृत्त में जहां