ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका (दयानन्दसरस्वतीविरचिता)/२६. अधिकारानधिकारविषयः

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अथाधिकारानधिकारविषयः संक्षेपतः[सम्पाद्यताम्]

वेदादिशास्त्रपठने सर्वेषामधिकारोऽस्त्याहोस्विन्नेति ?

सर्वेषामस्ति। वेदानामीश्वरोक्तत्वात्सर्वमनुष्योपकारार्थत्वात् सत्यविद्या - प्रकाशकत्वाच्च। यद्यद्धि खलु परमेश्वररचितं वस्त्वस्ति , तत्तत्सर्वं सर्वार्थमस्तीति विजानीमः। अत्र प्रमाणम् -

यथेमां वाचां कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्म राजन्याभ्यां शूद्राय चाय्यार्य च स्वाय चारणाय। प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृध्यतामुप मादो नमतु॥1॥

- य॰ अ॰ 26। मन्त्र 2॥

भाष्यम् - अस्याभिप्रायः - परमेश्वरः सर्वमनुष्यैर्वेदाः पठनीयाः पाठ्या इत्याज्ञां ददाति। तद्यथा -( यथा) येन प्रकारेण , ( इमाम्) प्रत्यक्षभूतामृग्वेदादिवेदचतुष्टयीं , ( कल्याणीम्) कल्याणसाधिकां , ( वाचम्) वाणीं , ( जनेभ्यः) सर्वेभ्यो मनुष्येभ्योऽर्थात् सकलजीवोपकाराय , ( आवदानि) आसमन्तादुपदिशानि , तथैव सर्वैर्विद्वद्भिः सर्वमनुष्येभ्यो वेदचतुष्टयी वागुपदेष्टव्येति।

अत्र कश्चिदेवं ब्रूयात् - जनेभ्यो द्विजेभ्य इत्यध्याहार्य्यं , वेदाध्ययनाध्यापने तेषामेवाधिकारत्वात् ?

नैवं शक्यम् - उत्तरमन्त्रभागार्थविरोधात्। तद्यथा - कस्य कस्य वेदाध्ययन - श्रवणेऽधिकारोऽस्तीत्याकाङ्क्षायामिदमुच्यते -

(ब्रह्मराजन्याभ्यां) ब्राह्मणक्षत्रियाभ्यां , ( अर्य्याय) वैश्याय , ( शूद्राय) , ( चारणाय) अतिशूद्रायान्त्यजाय , ( स्वाय) स्वात्मीयाय पुत्राय भृत्याय च , सर्वैः सैषा वेदचतुष्टयी श्राव्येति। (प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह॰) यथाहमीश्वरः पक्षपातं विहाय , सर्वोपकारकरणेन सह वर्त्तमानः सन् , देवानां विदुषां प्रियः , दातुर्दक्षिणायै सर्वस्वदानाय प्रियश्च भूयासं स्याम् , तथैव भवद्भिः सर्वैर्विद्वद्भिरपि सर्वोपकारं सर्वप्रियाचरणं मत्वा सर्वेभ्यो वेदवाणी श्राव्येति। यथायं (मे) मम कामः समृध्यते , तथैवैवं कुर्वतां भवतां (अयं कामः समृध्यताम्) इयमिष्टसुखेच्छा समृध्यतां सम्यग्वर्धताम्। यथादः सर्वमिष्टसुखं मामुपनमति , ( उपमादो नमतु) तथैव भवतोऽपि सर्वमिष्टसुखमुपनमतु सम्यक् प्राप्नोत्विति।

मया युष्मभ्यमयमाशीर्वादो दीयत इति निश्चेतव्यम्। यथा मया वेदविद्या सर्वार्था प्रकाशिता , तथैव युष्माभिरपि सर्वार्थोपकर्त्तव्या। नात्र वैषम्यं किञ्चित् कर्त्तव्यमिति। कुतः ? यथा मम सर्वप्रियार्था पक्षपातरहिता च प्रवृत्तिरस्ति , तथैव युष्माभिराचरणे कृते मम प्रसन्नता भवति , नान्यथेति। अस्य मन्त्रस्यायमेवार्थोऽस्ति। कुतः ? ' बृहस्पते अतियदर्य ' इत्युत्तरस्मिन्मन्त्रे हीश्वरार्थस्यैव प्रतिपादनात्॥

भाषार्थ - प्र॰ - वेदादि शास्त्रों के पढ़ने पढ़ाने, सुनने और सुनाने में सब मनुष्यों का अधिकार है वा नहीं?

उत्तर - सब का है। क्योंकि, जो ईश्वर की सृष्टि है, उस में किसी का अनधिकार नहीं हो सकता। देखिये कि जो जो पदार्थ ईश्वर से प्रकाशित हुए हैं, सो सो सब के उपकारार्थ हैं।

प्रश्न - वेदों के पढ़ने का अधिकार केवल तीन वर्णों को ही है, क्योंकि शूद्रादि को वेदादि शास्त्र पढ़ने का निषेध किया है। और द्विजों के पढ़ाने में भी केवल ब्राह्मण ही का अधिकार है।

उत्तर - यह बात सब मिथ्या है। इस का विवेक और उत्तर वर्णविभाग विषय में कह आये हैं। वहां यही निर्णय हुआ है कि मूर्ख का नाम शूद्र है और अतिमूर्ख का नाम अतिशूद्र है। उन के पढ़ने पढ़ाने का निषेध इसलिये किया है कि उन को विद्याग्रहण करने की बुद्धि नहीं होती है।

प्रश्न - परन्तु क्या सब स्त्री पुरुषों का वेदादि शास्त्र पढ़ने सुनने का अधिकार है?

उत्तर - सब को है। देखो! इस में यजुर्वेद ही का यह प्रमाण लिखते हैं-

(यथेमां वाचं कल्याणीं॰) इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि वेदों के पढ़ने पढ़ाने का सब मनुष्यों को अधिकार है, और विद्वानों को उनके पढ़ाने का। इसलिये ईश्वर आज्ञा देता है कि-हे मनुष्य लोगो! जिस प्रकार मैं तुम को चारों वेदों का उपदेश करता हूं, उसी प्रकार से तुम भी उन को पढ़ के सब मनुष्यों को पढ़ाया और सुनाया करो। क्योंकि यह चारों वेदरूप वाणी सब का कल्याण करने वाली है। तथा (आवदानि जनेभ्यः) जैसे सब मनुष्यों के लिये मैं वेदों का उपदेश करता हूं, वैसे ही सदा तुम भी किया करो।

प्रश्न - 'जनेभ्यः' इस पद से द्विजों ही का ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि जहां कहीं सूत्र और स्मृतियों में पढ़ने का अधिकार लिखा है, वहां केवल द्विजों ही का ग्रहण किया है?

उत्तर - यह बात ठीक नहीं है, क्योंकि जो ईश्वर का अभिप्राय द्विजों ही के ग्रहण करने का होता, तो मनुष्यमात्र को उन के पढ़ने का अधिकार कभी न देता। जैसा कि इस मन्त्र में प्रत्यक्ष विधान है-

(ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्य्याय च स्वाय चारणाय) अर्थात् वेदाधिकार जैसा ब्राह्मणवर्ण के लिये है वैसा ही क्षत्रिय, अर्य = वैश्य, शूद्र, पुत्र, भृत्य और अतिशूद्र के लिये भी बराबर है। क्योंकि वेद ईश्वरप्रकाशित है। जो विद्या का पुस्तक होता है, वह सब का हितकारक है। और ईश्वररचित पदार्थों के दायभागी सब मनुष्य अवश्य होते हैं। इसलिये उस का जानना सब मनुष्यों को उचित है। क्योंकि वह माल सब के पिता का सब पुत्रों के लिये है, किसी वर्णविशेष के लिये नहीं। (प्रियो देवानाम्) जैसे मैं इस वेदरूप सत्यविद्या का उपदेश करके विद्वानों के आत्माओं में प्रिय हो रहा तथा (दक्षिणायै दातुरिह भूयासं) जैसे दानी वा शीलवान् पुरुषों को प्रिय होता हूं, वैसे ही तुम लोग भी पक्षपातरहित होकर वेदविद्या को सुना कर सब को प्रिय हो। (अयं मे कामः समृध्यताम्) जैसे यह वेदों का प्रचाररूप मेरा काम संसार के बीच में यथावत् प्रचरित होता है, इसी प्रकार की इच्छा तुम लोग भी करो, कि जिस से उक्त विद्या आगे को भी सब मनुष्यों में प्रकाशित होती रहे। (उप मादो नमतु) जैसे मुझ में अनन्त विद्या से सब सुख हैं, वैसे जो कोई विद्या का ग्रहण और प्रचार करेगा, उस को भी मोक्ष तथा संसार का सुख प्राप्त होगा।

यही इस मन्त्र का अर्थ ठीक है। क्योंकि, इस से अगले मन्त्र (बृहस्पते अति यदर्य्य॰) में भी परमेश्वर ही का ग्रहण किया है। इस से सब के लिए वेदाधिकार है॥1॥

वर्णाश्रमा अपि गुणकर्माचारतो हि भवन्ति। अत्राह मनुः -

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।

क्षत्रियाज्जातमेवन्तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च॥1॥

- मनु॰ अ॰ 10। श्लो॰ 65॥

भाष्यम् - शूद्रः पूर्णविद्यासुशीलतादिब्राह्मणगुणयुक्तश्चेद् ब्राह्मणतामेति , ब्राह्मणभावं प्राप्नोति , योऽस्ति , ब्राह्मणस्याधिकारस्तं सर्वं प्राप्नोत्येव। एवमेव कुचर्य्याऽधर्माचरणनिर्बुद्धिमूर्खत्व-पराधीनतापरसेवादिशूद्रगुणैर्युक्तो ब्राह्मणश्चेत् स शूद्रतामेति , शूद्राधिकारं प्राप्नोत्येव। एवमेव क्षत्रियाज्जातं क्षत्रियादुत्पन्नं वैश्यादुत्पन्नं प्रति च योजनीयम्। अर्थाद्यस्य वर्णस्य गुणैर्युक्तो यो वर्णः स तत्तदधिकारं प्राप्नोत्येव॥1॥

एवमेवापस्तम्बसूत्रेऽप्यस्ति -

धर्यचर्य्यया जघन्यो वर्णः

पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ॥1॥

अधर्मचर्य्यया पूर्वो वर्णो

जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ॥2॥

- प्रपाठक 2। पटल 5। खं॰ 11। सू॰ 10। 11॥

भाष्यम् - सत्यधर्माचरणेनैव शूद्रो , वैश्यं क्षत्रियं ब्राह्मणं च वर्णमापद्यते , समन्तात् प्राप्नोति सर्वाधिकारमित्यर्थः। जातिपरिवृत्तावित्युक्ते जातेर्वर्णस्य परितः सर्वतो या वृत्तिराचरणं तत्सर्वं प्राप्नोति॥1॥

एवमेव स लक्षणेनाधर्माचरणेन पूर्वो वर्णो ब्राह्मणो , जघन्यं स्वस्मादधः स्थितं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च वर्णमापद्यते , जातिपरिवृत्तौ चेति पूर्ववत्। अर्थाद् धर्माचरणमेवोत्तमवर्णाधिकारे कारणमस्ति।

एवमेवाधर्माचरणं कनिष्ठवर्णाधिकारप्राप्तेश्चेति॥2॥

यत्र यत्र शूद्रो नाध्यापनीयो न श्रावणीयश्चेत्युक्तं तत्रायमभिप्रायः - शूद्रस्य प्रज्ञाविरहत्वाद्विद्या-पठनधारणविचारासमर्थत्वात्तस्याध्यापनं श्रावणं व्यर्थमेवास्ति , निष्फलत्वाच्चेति।

भाषार्थ - वर्णाश्रमव्यवस्था भी गुणकर्मों के आचारविभाग से होती है। इस में मनुस्मृति का भी प्रमाण है कि-(शूद्रो ब्राह्मणता॰) शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है। अर्थात् गुण कर्मों के अनुकूल ब्राह्मण हो तो ब्राह्मण रहता है तथा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के गुण वाला हो तो वह क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हो जाता है। वैसे शूद्र भी मूर्ख हो तो वह शूद्र रहता और जो उत्तम गुणयुक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। वैसे ही क्षत्रिय और वैश्य के विषय में भी जान लेना।

जो शूद्र को वेदादि पढ़ने का अधिकार न होता तो वह ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य के अधिकार को कैसे प्राप्त हो सकता? इस से यह निश्चित जाना जाता है कि पच्चीसवें वर्ष में वर्णों का अधिकार ठीक ठीक होता है , क्योंकि पच्चीस वर्ष तक बुद्धि बढ़ती है। इसलिये उसी समय गुण कर्मों की ठीक ठीक परीक्षा करके वर्णाधिकार होना उचित है।

तथा आपस्तम्बसूत्र में भी ऐसा लिखा है- (धर्मचर्यया॰) अर्थात् धर्माचरण करने से नीचे के वर्ण पूर्व पूर्व वर्ण के अधिकार को प्राप्त हो जाते हैं। सो केवल कहने ही मात्र को नहीं, किन्तु जिस-जिस वर्ण को जिन जिन कर्मों का अधिकार है, उन्हीं के अनुसार (आपद्यते जातिपरिवृत्तौ) वे यथावत् प्राप्त होते हैं॥1॥

(अधर्मचर्यया॰) तथा अधर्माचरण करके पूर्व पूर्व वर्ण नीचे नीचे के वर्णों के अधिकारों को प्राप्त होते हैं, इस से यह सिद्ध हुआ कि वेदों के पढ़ने सुनने का अधिकार सब मनुष्यों को बराबर है॥2॥

इति संक्षेपतोऽधिकारानधिकारविषयः॥25॥