अभङ्गपद्यम् ०१
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| मराठी(मूलम्) | संस्कृतम् |
|---|---|
| १ देवाचिये द्वारी उभा क्षणभरी।तेणे मुक्ति चारी साधियेल्या॥१ |
१ एकं वापि क्षणं तिष्ठेत् देवद्वारे नरो यदि । |
हरिपाठ: ज्ञानेश्वरकृत: मराठी-संस्कृतभाषाभ्याम्
| मराठी(मूलम्) | संस्कृतम् |
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| १ देवाचिये द्वारी उभा क्षणभरी।तेणे मुक्ति चारी साधियेल्या॥१ |
१ एकं वापि क्षणं तिष्ठेत् देवद्वारे नरो यदि । |
हरिपाठ: ज्ञानेश्वरकृत: मराठी-संस्कृतभाषाभ्याम्