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पृष्ठम्:विक्रमाङ्कदेवचरितम् .djvu/134

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Ya w w w པས་ ་་ ལ་ 2 \ רS ༄་་ ་་་་་་་་་་་་་་་ ༦ ༥༥ चन्द्रसदृश मुख को देखे बिना वह प्रात: कालीन नीलकुमुद के सदृश दीन नेत्रों से युक्त था अर्थात् उदास रहा करता था । जैसे चन्द्रदर्शन बिना नीलकुमुद विकसित नहीं होता वैसे ही पुत्र दर्शन विना राजा की आखें दीन थीं। अर्थात् राजा उदास रहते थे । उवाच कण्ठागतबाष्पगद्गदैः पदैः कदाचित्सहधर्मचारिणीम्। सरस्वतीहारलातामिबोज्वलां प्रकाशयन्दन्तमयूखचन्द्रिकाम् ॥२८॥ अचय: (सः) कदाचित् सरस्वतीहारलताम् इव उज्वलां दन्तमयूखमालिकों प्रकाशयन् कण्ठागतबाष्पगद्रदै: पदैः सहधर्मचारिणीम् उवाच । ठयाख्या सः नृपः कदाचित् सरस्वती वाणी वाग्देवता तस्या मौक्तिकनिर्मिता या हारलता तामिवोज्वलां शुभ्रवण दन्तानां रदनानां मयूखानां किरणानां 'किरणोस्रमयूखांशुगभस्तिघृणिरश्मयः' इत्यमरः । चन्द्रिका ज्योत्स्ना ‘चन्द्रिका कौमुदीज्योत्स्ना' इत्यमरः । तां प्रकाशयन् विस्तारयन् कण्ठे गले अागतानि यानि बाष्पाण्यूष्माश्रुणि 'बाष्पमूष्माश्रुकशिपुत्वन्माच्छादनं द्वयम्' इत्यमरः । तैर्मद्गदैनतिस्पष्टमुच्चारितै: पदै: शब्दविन्यासैस्सहधर्मचारिणों स्वपत्नीमुवाच । अत्रोपमालङ्कारः ॥ Tero किसी समय उस राजा ने सरस्वती की मोती की माला के समान दातों की शुभ्र किरणों की चांदनी की प्रकाशित करते हुए, भरे गले से अपनी पत्नी से कहा।