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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/९३८

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६१७ ॥१०८ ॥१०६ ॥११० ॥१११ ॥११२ तुषारान्बर्बरांश्चैव पुलिन्दान्दरदान्खसान् । लम्पकानन्ध्रकान्द्रान्किरातांश्चैव स प्रभुः प्रवृत्तचको बलवान्म्लेच्छानामन्तकृद्बली | अदृश्यः सर्वभूतानां पृथिवीं विचरिष्यति मानवः स तु संजज्ञे देवस्यांशेन धोमतः । पूर्वजन्मनि विष्णुर्यः प्रसितिर्नाम वीर्यवान् गात्रेण वै चन्द्रसमः पूर्ण कलियुगेऽभवत् । इत्येता स्तस्य देवस्य दश संभूतयः स्मृताः तं तं कालं च कायं च तत्तदुद्दिश्य कारणम् । अंशेन त्रिषु लोकेषु तास्ता योनीः प्रपत्स्यते पञ्चविंशोत्थिते कल्पे पञ्चविशति वै समाः । विनिघ्नन्सर्वभूतानि मानुषानेव सर्वशः कृत्वा बीजावशेषां तु महीं क्रूरेण कर्मणा । संशातयित्वा वृषलान्प्रायशस्तानधार्मिकान् ततः स वै तदा कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः । कर्मणा निहता ये तु सिद्धास्ते तु पुनः स्वयम् अकस्मात्कुपिताऽन्योन्यं भविष्यन्ति च मोहिताः । क्षपयित्वा तु तान्सर्वान्भाविनाऽर्थेन चोदितान् || गङ्गायमुनयोर्मध्ये निष्ठां प्राप्स्यति सानुगः । ततो व्यतीते कल्कौ तु सामान्यैः (त्यैः) सह सैनिकैः ॥ नृपेष्वथ विनष्टेषु तदा त्वप्रग्रहाः प्रजाः । रक्षणे विनिवृत्ते तु हत्वा चान्योन्यमाहवे ॥११३ ॥११४ ॥११५ ॥११८ अष्टनवतितमोऽध्यायः तुषार, बर्बर, पुलिन्द, दरद, खस, लम्पक, अन्ध्रक, रुद्र, किरात प्रभृति सबको परम ऐश्वर्यशाली, बलवान्, म्लेच्छों को नष्ट करने वाले भगवान् नष्ट कर देंगे और समस्त जीवों से अदूरय रहकर पृथ्वी भर में विचरण करेंगे । १०४-१०६। जो भगवान् विष्णु पूर्वजन्म में परमबलशाली प्रमिति के रूप में वर्तमान रहते हैं, वे ही देवांश भूत होकर मनुष्य योनि में जन्म धारण करते हैं । कलियुग के पूर्ण हो जाने पर चन्द्रमा के समान शरीर धारण कर वे ही उत्पन्न हुए थे। उन परम महिमामय भगवान् की ये दस सम्भूतियाँ ( अवतार ) कही गई है । जो-जो समय, शरीर, और कारण भगवान् के अवतारों के लिये ऊपर कहे गये हैं, उनकी परिस्थिति के अनुसार अंशावतार भगवान विष्णु ने उन योनियों में जन्म धारण किया । ११०-११२। पच्चीसवों कल्प आने पर पच्चीस वर्ष जब व्यतीत हो जाता है, उस समय भगवान् समस्त जीवों का विनाश करते हुए मनुष्यों को सर्वाशित: नष्ट करते हुए, अपने क्रूर कर्म द्वारा पृथ्वी को बीजावशेष कर देते हैं, ऊपर कहे गये उन परम अधार्मिक वृषलों का संहार कर सेनाओं के समेत अपने अवतार धारण को वे चरितार्थ (सफल ) कर देते हैं। उस समय को प्रजाएँ अपने कर्मों द्वारा यद्यपि नाश को प्राप्त हो जाती है, फिर भी उन्हें पुनः स्वयमेव सिद्धि प्राप्त होती है । तदनन्तर अकस्मात् वे आपस में ही एक दूसरे के ऊपर मोहवश कुपित हो जायगी, भावीवश इस प्रकार के गृह कलह में निरत उन सारी प्रजाओं का विनाश कर अपने अनुचरों समेत वे भगवान् गङ्गा यमुना के संगम पर अपने इस घोर कर्म की समाप्ति करेगे ।११३-१९६३ | तदन्तर कल्कि रूपधारी भगवान् के अवसान हो जाने पर, साधारण सैनिकों के साथ राजाओं के नष्ट हो जाने पर प्रजाएँ आश्रय-विहीन हो जायँगी । अपनी रक्षा करने का भी उन्हे साहस नही रहेगा, आपस में युद्ध कर एक दूसरे को मार