4 षण्णवतितमोऽध्यायः योऽसूजच्चाऽऽदिपुरुषं पुरा चक्रे प्रजापतिम् । अदितेरपि पुत्रत्वमेव यादवनन्दनः ॥ देवो विष्णुरिति ख्यातः शक्कादव रजोऽभवत् प्रसादजं यस्य विभोरदित्याः पुत्रकारणम् । वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम् ययातिवंशजस्याथ वसुदेवस्य धीमतः । कुलं पुण्यं यतः कर्म भेजे नारायणः प्रभुः सागरा: समकम्पन्त चेलुश्च धरणीधराः | जज्वलुश्चाग्निहोत्राणि जायमाने जनार्दने शिवाश्च प्रवदुर्वाताः प्रशान्तमभवद्रजः | ज्योतींष्यभ्यधिकं रेजुर्जायमाने जनार्दने अभिजिन्नाम नक्षत्रं जयन्ती नाम शर्वरी | मुहूर्तो विजयो नाम यत्र जातो जनार्दनः अव्यक्तः शाश्वतः कृष्णो हरिर्नारायणः प्रभुः । जायते स्मैव भगवान्नयनर्मोहयन्प्रजाः आकाशात्पुष्पवृष्टीश्च ववर्ष त्रिदशेश्वरः । गोभिर्मङ्गलयुक्ताभिः स्तुवन्तो मधुसूदनम् ॥ महर्षयः सगर्धा उपतस्थुः सहस्रशः वसुदेवस्तु तं रात्रौ जातं पुत्रमधोक्षजम् । श्रीवत्सलक्षणं दृष्टवा दिवि दिव्यैः सुलक्षणैः ॥ उवाच वसुदेवः स्वं रूपं संहर वं प्रभो ८७७ ॥१६६ ॥१६७ ॥१६८ ॥१६६ ॥२०० ॥२०१ ॥२०२ ॥२०३ ॥२०४ ( सर्वदा एक रूप ) सर्वशक्तिसम्पन्न हरि हैं । जो सृष्टि के आदिम काल में आदिपुरुष प्रजापति ब्रह्मा को सृष्टि करते हैं । वे यादवनन्दन कृष्ण ही अदिति के पुत्र रूप में प्रादुर्भूत होकर देवदेव विष्णु एवं इन्द्र के छोटे भाई उपेन्द्र के नाम से भी विख्यात होते है । वे ही सर्वशक्तिमान् अपने अनुग्रह से देवताओं के शत्रु दैत्यों-दानवों और राक्षसों के विनाश के लिये अदिति के पुत्र के रूप में प्रादुर्भूत होते हैं ।१९४-११७। राजर्षि वयाति के वंश में समुत्पन्न परम बुद्धिमान् वसुदेव का कुल परम पवित्र हुआ जिसमे भगवान् नारायण स्वयं प्रादुर्भूत होकर लौकिक कर्मों के अनुष्ठान में प्रवृत्त हुए । जिस समय वे भगवान् जनार्दन उत्पन्न हुए, उस समय सागर काँपने लगे, पर्वत हिलने लगे, अग्निहोत्र स्वयमेव प्रज्वलित हो उठे । मङ्गलकारी शीतल मन्द सुगंध वायु वहने लगी, धूल का उड़ना शान्त हो गया, इसी प्रकार भगवान् जनार्दन के उत्पन्न होनेपर सूर्य चन्द्रमा ग्रह नक्षत्रादि ज्योतिष्पुञ्जो का प्रताप अधिक निखर उठा | जिस शुभ वेला में भगवान् जनार्दन उत्पन्न हुए उस समय अभिजित् नामक नक्षत्र था, जयन्ती नामक रात्रि थी और विजय नामक मुहूर्त था |१६८-२०१९ | अव्यक्त, शाश्वन, प्रभु, नारायण भगवान् हरि अपने सुन्दर नेत्रो से प्रजाओं को मोहित करते हुए जिस समय प्रादुर्भूत हुए उस समय इन्द्र ने आकाश से पुष्प की वृष्टि की और सहस्रों की संख्या में एकत्र हो होकर गन्धर्वो और महर्षियो ने मांगलिक गानों से मधुसूदन की स्तुति की। वसुदेव ने रात्रि के समय श्रीवत्स चिह्न ( जिनके स्वरूप का साक्षात्कार इन्द्रियों से नही विभूषित, अन्यान्य दिव्य लक्षणों से अलंकृत अवोक्षज होता ) भगवान् को पुत्र रूप में समुत्पन्न देखा और
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