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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/८९६

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षण्णवतितमोऽध्याय| अतोऽस्य सहदेवायां शूरो जज्ञे मयासखः । शार्गदेवाऽजनत्तम्बं शौरी जज्ञे कुलोद्वहम् उपसगं वसुं चापि तनयौ देवरक्षितौ । एवं दश सुतास्तस्य कंसस्तानण्यघातयत् विजयं रोचनं चैव वर्धमानं तथैव च । एतान्सर्वान्महाभागानुपदेवा व्यजायत + स्वगाहवं महात्मानं वृकदेवी त्वजायत । आगाही च स्वसा चंद सुरूपा शिशिरायिणी सप्तमं देवकीपुत्रं सुनासा सुषुवे भुवम् । गवेषणं महाभागं सङ्ग्रामे चित्रयोधिनम् श्राद्धदेवं पुरा येन वनं विरचितं द्विजा | सैव्यायामददाच्छौरिः पुत्रं कौशिकमव्ययम् सुगन्धीव (न्धर्व) नराजी च शौरेरास्तां परिग्रहः । पुण्ड्रश्च कपिलेश्चैव वसुदेवात्मजौ हि तौ ॥ तयोराजाऽभवत्पुण्डू: कपिलस्तु वनं ययौ तस्यां समभवद्वीरो वसुदेवात्मजो बली। राजा नाम निषादोऽसौ प्रथमः स धनुर्धरः विख्यातो देवरातस्य महाभागः सुतोऽभवत् । पण्डितानां मतं प्राहुर्देवश्रवसमुद्भवम् अस्मक्यां लभते पुत्रमनादृष्टि यशस्विनम् । निवर्तः शकशत्रुघ्नं श्राद्धदेवं महाबलम् ८७५ ॥ १७७ ॥१७८ ॥१७६ ॥१८० ॥१८१ ॥१८२ ॥१८३ ॥१८४ ॥१८५ ॥१८६ शाङ्ग देवा के गर्भ से तम्बु नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई । शौरी ने कुलोद्रह को उत्पन्न किया। उपसङ्ग, वसु, देव, रक्षित, विजय, रोचन और वर्धमान नामक महाभाग्यशाली पुत्रों को उपदेवा ने उत्पन्न किया । वसुदेव के इन दस पुत्रों को भी कंस ने मार डाला था । वृकदेवी ने महात्मा स्वगाहव को उत्पन्न किया। इसी चूकदेवी का नामान्तर आगाही, स्वसा, सुरूपा और शिशिरायणी भी था । १७७-१८०। सुन्दर नासिकावाली देवको ने महाभाग्यशाली, संग्राम भूमि में विचित्र युद्ध करनेवाले गवेषण नामक पुत्र को उत्पन्न किया, जो उनके सातवें पुत्र स्वात हुए | द्विजवृन्द ! इन्हीं गवेषण ने पुर्वकाल में वनप्रान्त में श्राद्धदेव की रचना की थी | वसुदेव ने संव्या नामक अपनी एक अन्य पत्नी में कौशिक नामक परम पराक्रमशाली पुत्र को उत्पन्न किया था । सुगन्धी और वनराजी नामक जो दो अन्य स्त्रियाँ वसुदेव की थीं उनसे पुण्डू और कपिल नामक दो पुत्रों की उत्पत्ति हुई | वसुदेव के इन दोनों पुत्रों में पुण्ड्र राजा हुए और कपिल वन को चले गये ११८११८३७ वसुदेव का एक परम वलवान् निषाद नामक पुत्र और था, जो धनुर्धारियों में अप्रगण्य एवं परम पुरुषार्थी राजा था । देवरात का पुत्र परम यशस्वी एवं महाभाग्यशाली था । पण्डित लोग उसे देवश्रवा के नाम से जानते हैं। निवर्त ने अस्मकी से परमयशस्वी अनादृष्टि नामक पुत्र को उत्पन्न किया। इसी प्रकार महाबलवान् श्राद्धदेव और शक्र- शत्रुघ्न नामक दो पुत्र और हुए । यही श्राद्धदेव निषध जाति के मूल पुरुष थे और यही निषादों द्वारा पोषित + इदमधं नास्ति ख. घ. पुस्तकयोः ।