सामग्री पर जाएँ

पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/८१५

विकिस्रोतः तः
एतत् पृष्ठम् अपरिष्कृतम् अस्ति

७६४ वायुपुराणम् प्रादाच्च तस्ब भगवान्हरिर्नारायणो वरान् । अक्षतत्वं स्ववंशस्य वाजिमेधशतं तथा ॥ विभुं पुत्रं समुद्रं च स्वर्गे वासं तथाऽक्षयम् स समुद्रोऽश्वमादाय ववन्दे सरितां पतिः | सागरत्वं च लेभे स कर्मणा तेन तस्य वै तं चाश्वमेधिकं सोऽश्वं समुद्रात्प्राप्य पार्थिवः | आजहाराश्वमेधानां शतं चैव पुनः पुनः षष्टिपुत्रसहस्राणि दग्धान्यश्वानुसारिणाम् । तेषां नारायणं तेजः प्रविष्टानां महात्मनाम् ॥ पुत्राणां तु सहस्राणि षष्टिस्तु इति नः श्रुतम् ॠषय ऊचु सगरस्याऽऽत्मजा राज्ञः कथं जाता महाबलाः । विद्वान्ताः ॥१५० ॥१५१ ॥१५२ सूत उवाच द्वे पत्न्यौ सगरस्याऽऽस्तां तपसा दग्धकिल्विषे | ज्येष्ठा विदर्भदुहिता केशिनी नाम नामतः कनीयसो तु या तस्य पत्नी परमधर्मणी । अरिष्टनेमिदुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि और्वस्ताभ्यां वरं प्रादात्तपसाऽऽराधितःप्रभुः । एका जनिष्यते पुत्रं वंशकर्तारमोप्सितम् ॥ षष्टिपुत्र सहस्त्राणि द्वितीया जनयिष्यति ॥१५३ प्टसाहस्रा विधिना केन वा वद ॥१५४ ॥१५५ ॥१५६ ॥१५७ राजा को सुन्दर वरदान दिये। जिनसे उनको अपने वंश का अक्षयत्व, सो अश्वमेघ यज्ञों के सम्पन्न करने का सुअवसर, परम ऐश्वर्य सम्पन्न समुद्र का पुत्रत्व एव स्वर्ग लोक मे अनन्त काल पर्यन्त निवास प्राप्त हुए ।१४६- १५०। समस्त सरिताओं का स्वामी समुद्र उस समय उनके समीप अश्व लेकर उपस्थित हुआ और नमस्कार किया। राजा के उसी महान् कर्म से उसे सागरत्व ( सागर के पुत्रत्व ) को उपाधि प्राप्त हुई। इस प्रकार समुद्र से उस अश्वमेधयज्ञ के अश्व को प्राप्त कर राजा सगर ने अन्य सौ अश्वमेध यज्ञो को निर्विघ्न सम्पन्न किया । उसके उस प्रथम यज्ञ के पीछे पीछे चलने वाले जो साठ सहस्र पुत्र भस्म हुए थे वे सब के सब महा बलवान् पुत्रगण नारायण के तेज में तद्रूप होकर प्रविष्ट हो गये - ऐसा हमने सुना है |१५१-१५३॥ ऋषियों ने पूछा-सूत जी । राजा सगर के वे साठ सहस्र पुत्र गण, जो सब के सब परम वलवान् एवं विजयी थे, किस प्रकार से अथवा किस विधि से उत्पन्न हुए - यह बतलाइये |१५४| सूत जी बोले- उस राजा सगर को दो स्त्रियाँ थी, जिन्होंने अपनी घोर तपस्या द्वारा समस्त पापों को भस्म कर दिया था, वडी स्त्री विदर्भराज की कन्या केशिनी नाम से विख्यात थी, उनकी छोटी परम धर्मिष्ठ पत्नी जो थी, वे राजा अरिष्टनेमि की कन्या थो, अपने रूप में सारे भूमण्डल में वे अकेली थीं ।१५५-१५६। (उनका नाम सुमति था) तपस्या द्वारा सन्तुष्ट किये गये महामुनि और्व ने उन्हें वरदान दिया,