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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/७४९

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७२८ वायुपुराणम् शिशिरेषु तथा त्वग्न बहुकाष्ठं तथैव च । + इन्धनानि तु यो दद्याद्विजेभ्यः शिशिरागमे ' नित्यं जयति सङ्ग्रामे श्रिया युक्तश्च दीप्यते | सुरभोणि च माल्यानि गन्धवन्ति तथैव च पूजयित्वा तु पात्राणि श्राद्धे सत्कृत्य दापयेत् । गन्धवाहा महानद्यः सुखानि विविधानि च दातारमुपतिष्ठन्ति युवत्यश्च मनोरमाः । शयनासनानि रम्याणि भूमयो वाहनानि च श्राद्धेष्वेतानि यो दद्यादश्वमेधफलं लभेत् । श्राद्धकाले निवेद्यं च दर्शश्राद्ध उपस्थिते विप्राणां गुणयुक्तानां स्मृति मेधां च विन्दति | सर्पिष्पूर्णानि पात्राणि श्रद्धे सत्कृत्य दापयेत् X कुम्भदोहनधेनूनां बह्वीनां च फलं लभेत् । अस्मिस्तु मोदते लोके स्यन्दनैश्च सुवाहनैः श्राद्धे यथेप्सितं दत्त्वा पुण्डरीकस्य यत्फलम् | रम्यमावसथं दत्त्वा राजसूयफलं लभेत् वनं पुष्पफलोपेतं दत्त्वा सौरभमश्नुते । कूपारामतडागानि क्षेत्रघोषगृहाणि च ॥२३ ॥२४ ॥२५ ॥२६ ॥२७ ॥२८ ॥२६ ॥३० ॥३१ आ जाने पर जो ब्राह्मणों के लिए सम्पन्न होकर परम तेजस्वी होता अग्नि एवं प्रचुर परिमाण में इन्धन का दान करता है, नथवा शिशिर ऋतु इन्धन दान करता है, वह संग्राम में सर्वदा विजयी होता है, और शोभा है | श्राद्ध के अवसर पर मुगन्धित पुष्पों की मालाएँ तथा सुन्दर पात्रों को सरकार पूर्वक दान करना चाहिये । जो ऐसा करता है, उसे महानदियाँ सुगन्धित से युक्त होकर परम सुख पहुँचाती हैं, विविध सुखों की प्राप्ति होती है ।२३-२५॥ मनोरम युवती स्त्रियाँ उस दाता के पास उपस्थित होती हैं। विविध प्रकार की शय्या, मनोहर आसन, प्रचुर भूमि एवं विविध वाहन इन सब को जो श्राद्ध के अवसर पर देता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है । सामान्य श्राद्धो के अवसर पर अथवा दर्श श्राद्धों के अवसर पर जो इन वस्तुओं का दान सर्वगुण सम्पन्न ब्राह्मणों को करता है वह सुन्दर स्मरण शक्ति और बुद्धि को प्राप्त करता है | श्राद्ध के अवसर पर घृत से भरे हुए अनेक पात्रों का सत्कार पूर्वक दान करना चाहिये, जो ऐसा करता है, वह दोहन कलश समेत अनेक गौओं के दान का फल प्राप्त करता है । इस लोक में सुन्दर वाहनों एवं रथों का आनन्द प्राप्त करता है ।२६-२९। श्राद्ध के अवसर पर याचक की मनचाही वस्तु का दान करने से पुण्डरीक यज्ञ का एवं सुन्दर निवास स्थल का दान करने से राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त करता है । एवं फलों से समिन्बत वन का दान करने से मुगन्धित पदार्थों को प्राप्ति होती है। कूपों, बगीचों, तड़ागों, क्षेत्रो, गोशालाओ और गृहों के द करने से दाता स्वर्ग लोक में तब तक निवास करता है, जब तक चन्द्रमा और ताराएँ विद्यमान रहती हैं । श्राद्ध काल में रत्नजटित बिछावन और शय्या का दान करता है, उसके पितरगण सन्तुष्ट होते हैं, और दाता + इत उत्तरमेतदर्धंमधिकम् 'कायाग्निदीप्तिः प्राकाश्ये रूपं सौभाग्यमेव च ' इति ख. घ. ङ पुस्तकेयु । X एतदघंस्थानेऽयं पाठः 'कुम्भदोदोहधेनूनां वह्नीनां फलमश्नुते' इति ख. ग. घ ङ. पुस्तकेपु । ·