सप्ततितमोऽध्यायः दक्षिणेन च हस्तेन गृह्णीयाद्वै कमण्डलुम् | शौचं च वामहस्तेन गुदे तिस्रस्तु मृत्तिकाः दश चापि पुनर्दद्याद्वामहस्तक्रमेण तु | द्वाभ्यां वाऽपि पुनर्दद्याद्धस्तानां पश्व मृत्तिकाः मृदा प्रक्षाल्य पादौ च आचम्य च यथाविधि | आपस्त्याज्यास्त्रयश्चैव सूर्याग्निपवनाम्भसाम् कुर्यात्संनिहितं नित्यं प्राज्ञस्तीर्थे कमण्डलुम् । असत्कार्ये कार्यमेतैर्यथावत्पादधावनम् आचमनं द्वितीयेन देवकार्य ततः परम् | उपवासस्त्रिरात्रं तु दुष्टहस्ते ह्यदाहृतः विप्रकृष्टेन कृच्छ्रण प्रायश्चित्तमुदाहृतम् । स्पृष्ट्वा श्वानं श्वपार्क वा तप्तकृच्छ्र समाचरेत् मानुपास्थीनि संस्पृश्य उपोष्यं शुद्धिकरणम् | त्रिरात्रमुक्तं सन्नेहमेकरात्रमतोऽन्यथा फारस्कराः पुलिम्बाश्च तथाऽऽन्ध्रशबरादयः | पीत्वा चापो भूतिलये गत्वा चैव युगंधरास् सिन्धोरुत्तरपर्यन्तं तथा दिव्यन्तरे शतम् | पापदेशाश्च ये केचित्पापैरध्युपिता जनैः शिष्टैश्च वर्जिता ये च ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । गत्या देशानपुण्यांस्तु कृत्स्नं पापं समस्तुते मनोव्यक्तिरथाग्निच काले संवोपलेपनम् | विख्यापनं च शौचानां नित्यमज्ञानमेव च ७१३ ॥६२ ॥६३ ॥६४ ॥६५ ॥६६ ॥६७ ॥६८ ॥६६ ॥७० ॥७१ ॥७२ कमंडलु ( जलपात्र ) ग्रहण करना चाहिये । मलद्वार को बाएँ हाथ से तीन बार मिट्टी लगा कर शुद्ध करना चाहिये |६२१ बाएं हाथ में दस बार मृत्तिका लगाकर अथवा दोनों हाथों में पांच बार मृत्तिका लगानी चाहिये । पुनः मिट्टी लगाकर पैरों को भली भांति स्वच्छकर विधिपूर्वक आचमन करे । पुनः सूर्य, अग्नि, और पवन के उद्देश्य से तीन बार जल त्याग करे /६३-६४ | बुद्धिमान् पुरुप को तीर्थ के समीप में सर्वदा कमंडलु रखना चाहिये । इस कमंडलु के जल से पादप्रक्षालन - आदि छोटे-छोटे कार्य भी करने चाहिये । पादप्रक्षालन के उपरान्त आचमन करना चाहिये तदुपरान्त देवकार्य करना चाहिये । अपवित्र हाथ से आचमन और देवकार्य करने पर तीन रात का उपवास कहा गया है । ६५-६६। उपवास न करने पर अतिशय कष्ट द्वारा प्रायश्चित्त का विधान किया गया है। श्वान अथवा चाण्डाल का स्पर्श करके तप्तकृच्छ्र प्रायश्चित्त करना चाहिये |६७ | मनुष्य की अस्थियों का स्पर्श करने पर उपवास ही शुद्धि का कारण है । स्नेह पूर्वक यह उपवास तीन रात अथवा एक रात का कहा गया है । ६८ कारस्कर, पुलिन्द, आन्ध्र, शवर प्रभृति अपवित्र देशों को यात्रा कर, भूतिलय (स्थान विशेष) मे जलपान कर तथा युगन्धर नामक स्थान को यात्रा कर, सिन्धु के उत्तरीय प्रदेश, दिव्यन्तर के शत नामक देश, एवं अन्याम पापियों के प्रदेशों की, जहाँ जाने के लिए वेदों के पारंगत ब्राह्मण एवं शिष्ट लोग निषेध करते हैं अथवा जहाँ पाप ऐसे लोगों का सर्वथा अभाव रहता है तथा जहाँ जाने से पाप की की वृद्धि होती है, मात्रा करने पर समस्त पाप का भागी होना पड़ता है |६९-७१ | मनोव्यक्ति, अग्नि, समयवश किया हुआ उपलेषन, शोच के लिये निषिद्ध फा०६०
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