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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/६३४

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नवषष्टितमोऽध्यायः मातुलं भजते पुत्रः पितृम्भजति कन्यका । ययाशीला भवेन्माता तथाशीलो भवेत्सुतः यद्वर्णा तु भवेद्भूमिस्तद्वणं सलिलं ध्रुवम् । सातॄणां शोलदोषेण तथा शीलगुणैः पुनः ॥ विभिन्नास्तु प्रजाः सर्वास्तथा ख्यातिवशेन च बलशीलादिभिस्तासामदितिर्धर्मतत्परा | * गन्धशीला दितिश्चैव प्रवार्ध्ययनशालिनी || धर्मशीलादिभिश्चैव प्रबोधबलशालिनी गोतशोला तथाऽरिष्टा मायाशीला दनुः स्मृता | विनता तु पुनर्देवी वैहायसगतिप्रिया तपोमयेन शोलेन सुरभिः समलंकृता । क्रोधशीला तथा कद्दू: क्नोधेनासुखशीलका दनायुषायाः शीलं वै वैराग्रहणक्षम् | त्वं च देवि महाभागे क्रोशीला मताऽसि में इत्येतानि स्वशीलानि स्वभावालोकनान्नृणां | कर्मतो यत्नतो बुद्ध्या रूपतो बलतस्तथा ॥ क्षमातश्चैव भिन्नानि भावितार्थबलेन च ६१३ Hεo ॥६१ ॥६२ ||६३ ॥६४ ॥६५ ॥६६ कि तुम्हारे इन दोनों पुत्रों ने तुम से क्या दुर्व्यवहार अथवा कैसी अनीतिपूर्ण बातें को है, और तुमने इन्हें क्या उत्तर दिया है।'- पुत्र अपने मामा के स्वभाव एवं गुणो का अनुसरण करता है, कन्या अपने पिता के स्वभाव एवं गुणादि को प्राप्त करती है, जिस प्रकार की माता होती है, उसका पुत्र भी उसी प्रकार का होता है, क्योंकि जैसा पृथ्वी का रंग होता है उस पर रहनेवाला जल निश्चय ही उसी रंग का होता है। माता के शील सदाचार गत अवगुणो के तथा गुगों के कारण ही भिन्न भिन्न प्रकार की सन्ततियाँ उत्पन्न होती हैं, प्रशंसा के वश होकर भी लोगों के स्वभाव मे कुछ अन्तर हो जाता है |८९-९१ ॥ हमारी सभी पत्नियों में अदिति बल, शोल आदि सद्गुणो से युक्त तथा धर्म में सर्वदा निरत रहने वाली है । गन्धयुक्त दिति भी नित्य तपस्या एवं अध्ययन आदि में निरत रहती है, धर्म शीलादि सद्गुणों से उसका ज्ञान एवं पराक्रम — दोनों बहुत बढ़-चढ़े है। अरिष्टा गीतो को भली-भांति जानती है, दनु का लोग माया छल आदि की भी जानकार वतलाते हैं, देवी विनता आकाश में उड़ने को बहुत पसन्द करती है, सुरभि अपने तपोमय जीवन से बहुत अधिक शोभा पाती है, कद्रू वड़ो क्रोध करने वाली है, उसे क्रोध करने मे ही सुख मिलता है । दनायुषा का आचरण वैर, एवं अनुग्रह दोनों प्रकार के विपरीत स्वभावो से संयुक्त है, अर्थात् समय-समय पर वह क्रोध एवं दया - दोनों का व्यवहार करती है, किन्तु हे देवी ! महाभाग्य शालिनि ! तू तो मेरी राय में अधिक क्रोध करने वाली हो ।६२-६५। ये अपने आचरण मनुष्यों के विविध स्वभावों के देखने से, कर्म से, यत्न करने से, बुद्धि से, रूप से, वल से क्षमा से एवं भवितव्यता के वश होकर भिन्न हो जाते हैं.

  • इदमधं नास्ति क. पुस्तके |

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