६०० वायुपुराणम् अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः कश्यपीय प्रजासर्गः सूत उवाच अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दनुपुत्रान्निबोधत | अभवन्दनुपुत्रास्तु वंशे ख्याता महासुराः विप्रचित्तिप्रधानास्ते शतं तीव्रपराक्रमाः । सर्वे लब्धवराश्चैव सुतप्ततपसस्तथा सत्यसंधाः पराकान्ताः क्रूरा मायाविनश्च ते । सहावला अयज्वानो ह्यब्रह्मण्याञ्च दानवाः ॥ कीर्यमानान्मया सर्वान्प्राधान्येन निवोधत द्विमूर्धा शङ्कुकर्णश्च तथा शकुनिरामयः | शकुकर्णो महाविश्वो गवेष्ठिर्दुन्दुभिस्तथा अजामुखोऽथ भगवाञ्शिलो वामनसस्तथा । मरीचिरक्षकश्चैव महागार्ग्योऽगिरावृतः दिक्षोभ्यश्च सुकेतुश्च सुवीर्यः सुहृदस्तथा । इन्द्रजिद्विश्वजिच्चैव तथा सुरविमर्दनः एफचक्रः सुवाहश्च तारकश्च महाबलः । वैश्वानरः पुलोमा च प्रवीणोऽथ महाशिराः ॥२ ॥३ ॥४ 11५ ॥६ ॥७ अध्याय ६८ कश्यप की सन्ततियों की सृष्टि - सूत ने कहा – ऋषिवृन्द ! अब इसके उपरान्त मैं दंनु के पुत्रों का वृत्तान्त कह रहा हूँ सुनिये | वे दनु के पुत्र अपने वंश में परम विख्यात एवं महान् असुर थे |१| उनमें सब का प्रधान विप्रचित्ति था, उनकी संख्या सैकड़ों को थो । जो सब के सब परमपराक्रमी थे। उन सभी को वरदान मिले हुए थे, वे सय के सव परम तपस्वी थे । इतना होने पर भी वे दृढप्रतिज्ञ थे, परमविक्रमशील थे, क्रूर थे, मायावी थे । महाचलवान् थे, यज्ञादि में उनकी निष्ठा नही थी, ब्राह्मण धर्म के विरोधी थे । उन्हें दानव नाम से लोग जानते हैं | उन सबों मे जो प्रधान - प्रधान दानव हो गये हैं, उनका में वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये | २-३ | द्विमूर्धा, शकुकर्ण, शकुनिरामय, शंकुकर्ण, महाविश्व, गवेष्ठि, दुन्दुभि, अजामुख, ऐश्वर्यशाली शिल, वामनस, मरीचि, रक्षक, महागार्ग्य, अङ्गिरावृत, विक्षोभ्य, सुकेतु, सुवीर्य, सुहृद, इन्द्रजितू, विश्वजित् सुरविमर्दन एक चक्र, सुवाह, महाबलवान् तारक वैश्वानर, पुलोमा, प्रवीण, महाशिरा, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाभसुर मुण्डक
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