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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/६०९

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५८८ वायुपुराणम ततो देवास्तिरोभूत ईश्वरे ह्यकुतोभयाः | प्रपन्ना अणिमात्रैश्च युक्ता योगचलान्विताः ततस्तेषां तु यास्तन्वस्ताऽभवन्द्वादश हृदाः । जया इति समाख्याता जातारचोवधिसंनिभाः ततः स्वायंभुवे तस्मिन्सर्गे ते जज्ञिरे सुराः । अजितायां चे पुत्रा अजिता द्वादशात्मकाः विधिश्च सुनयश्चैव क्षेमो नन्दोऽव्ययस्तथा । प्राणोऽपानः सुधामा च ऋतुराक्तिव्यवस्थिताः ॥ इत्येते मानसाः सर्वे अजिता द्वादश स्मृताः ● ॥३४ ये च यज्ञे सुरैः सार्धं यज्ञभाजस्तदा स्मृताः । स्वायंभुवेऽन्तरे पूर्व ततः स्वारोचिपे पुनः तुषिता नाम मे ह्यासन्प्राणाख्या यज्ञियाः सुराः । पुनस्ते तुपिता देवा उत्तमे त्वन्तरे स्वयम् ॥ तुषितायां सनुत्पन्नाः पुनः पुत्राः स्वरोचिषः उत्तमस्य तु ते पुत्राः सत्यायां जज्ञिरे शुभाः । ततः सत्याः स्मृता देवा उत्तमे चान्तरे तदा अभवन्यज्ञभाजस्ते वृतोये द्वापरान्तरे । ते तु सत्याः पुनर्देवाः संप्राप्ते तामसेऽन्तरे हर्षा ये तमसः पुत्रा जज्ञिरे द्वादशैव तु । हरयो नाम ते देवा यजभाजस्तथाऽभवन् ततस्ते हरयो देवाः प्राप्ते चारिष्णवेऽन्तरे | विकुण्ठायां ततस्ते वै चरिष्णोजंजिरे सुराः ॥ वैकुण्ठा नाम ते देवाः पश्वमस्यान्तरे मनोः ॥३१ ॥३२ ॥३३ ॥३६ ॥३७ ॥३८ ॥३६ ॥४० अतहत हो गये ।२९-३०। तदनन्तर ईश्वर (ब्रह्मा) के अन्तहित होने पर देवगण निर्भर हो गये और अणिमा आदि से सयुक्त होकर योगबल का आश्रय ले योगाभ्याम मे दत्तचित्त हुए। जिससे उन सबों के शरीर समुद्र के समान विशाल वारह सरोवरो के रूप में परिणत हो गये जो जय नाम से विख्यात हुए ।३१-३२॥ तदनन्तर स्वायम्भूव नामक उस मन्वन्तर में वे देवगण अजिता के गर्भ से रुचि के बारह पुत्रो के रूप में उत्पन्न हुए, जो अजित गण के नाम से विख्यात हुये |३३॥ विधि मुनय (?) क्षेत्र, नन्द, अव्यय - प्राण, अपान, सुधामा, तु, शक्ति, ध्रुव और स्थिति से बारह अजित देवगण ब्रह्मा के मानस पुत्र रूप में स्मरण किये गये हैं |३४| ये देवगण उस स्वायम्भुव मन्वन्तर मे यज्ञ मे अन्यान्य देवताओं के साथ यज्ञ भाग के अधिकारी माने गये । तदनन्तर स्वारोचिष मन्वन्तर में पुनः वे तुपिता के गर्भ से स्वारोचिप मनु के पुत्र रूप में उत्पन्न हुए, उस समय वे तुषित और प्राण-इन दो नामों से विख्यात हुए, यज्ञ में इन्हें भाग पाने का अधिकार दिया गया । पुनः औत्तम मन्वतर में वे शुभदायी देवगण सत्या के गर्भ से उत्तम मनु के पुत्र रूप में उत्पन्न हुए और उक्त मन्वन्तर उसकी सत्य नाम से स्याति हुई, तृतीय मन्वन्तर के द्वापर युग मे वे देवगण यज्ञ भाग के अधिकारी हुए | वे सत्य नामक देवगण पुनः तामस नामक मन्वन्तर में तामस की हर्पा नामक पत्नी मे हरि नाम से उत्पन्न हुए और यज्ञ भाग के भोक्ता बने |३५-३६। तदनन्तर चारिष्णव नामक मन्वन्तर मे वे हरि नामक देवगण चरिष्णु मनु की विकुण्ठा नामक पत्नी मे उत्पन्न हुये इस पाँचवे मन्वन्तर वे देवगण बैकुण्ठ नाम से विख्यात