षट्षष्टितमोऽध्यायः त्रिषु कालेषु तस्यैता ब्रह्मणस्तवोंऽशजाः । कालो भूत्वा पुनचासौ रुद्रः संहरते प्रजाः संप्राप्ते चैव कल्पान्ते सप्तरश्मिदिवाकरः । भूत्वा संवर्तकादित्यो लोकांस्त्रीन्स तदा दहन् विष्णुः प्रजाऽनुगृह्णाति नामरूपविपर्ययैः । तस्यां तस्यामवस्थायां तत्तदुत्पाद्य कारणम् सत्त्वोद्रिक्ता तु या प्रोक्ता ब्रह्मणः पोरुषी तनुः । तस्यांशेन विजज्ञे स इह स्वायंभुवेऽन्तरे ॥ आकृत्यां मनसो देव उत्पन्नः प्रथमे विभुः ततः पुनः स वै देवः प्राप्ते स्वारोचिषेऽन्तरे | तुषितायां समुत्पन्नो ह्यजितस्तुषितः सह औत्तमे चान्तरे चैव तुषितस्तु विदुः स वै । वशवतभिरुत्पन्नो वशवर्ती हरिः पुनः सत्यायामभवत्सत्यः सत्यैः सह सुरोत्तमैः । तामसस्यान्तरे चापि संप्राप्ते पुनरेव हि ॥ भार्यायां हरिभिः सार्धं हरिरेव बभूव हि चारिष्णवेऽन्तरे चापि हरिर्देवः पुनस्तु सः । विकुण्ठायामजो जज्ञे ह्याभूतरजसैः सह ॥ वैकुण्ठः स पुनर्देवः संप्राप्ते चाक्षुषेऽन्तरे धर्मो नारायणः साध्यः साध्यैः सह सुरैरभूत् । स तु नारायणः साध्यः प्राप्ते वैवस्वतेऽन्तरे ५८१ ॥१२६ ॥१२७ ॥१२८ ॥१२६ ॥१३० ॥१३१ ॥१३२ ॥१३३ ॥१३४ ब्रह्मा के अंश से कालात्मा रुद्र की उत्पत्ति कही जाती है । सत्त्वगुणमयी सात्त्विकी मूर्ति में पुरुष के अंश से मज्ञ में विष्णु की उत्पत्ति हुई। तीनों कालों में उस ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न होनेवाली ये तीन मूर्तियाँ है । काल होकर पुनः वे ही रुद्र स्वरूप में प्रजाओं का संहार करते हैं, कल्पांत के अवसर पर वह सप्तरश्मि दिवाकर की मूर्ति घारणकर संवर्तक नामक आदित्य हो तीनों लोकों को भस्म करता है | १२५-१२७ विष्णु समय-समय पर विविध नाम एवं स्वरूप धारणकर उन-उन कारणों को उत्पन्न कर प्रजावर्ग के प्रति अनुग्रह का भाव रखते हैं । सत्त्वगुणमयी जो ब्रह्मा की पौरुषो मूर्ति कही गई है, उसके अंश से इस स्वायम्भुव मन्वन्तर मे वे विभु सर्वप्रथम आकृति के गर्भ द्वारा मानसिक संकल्प से उत्पन्न हुए ११२८-१२६। तदनन्तर पुनः वे अजित देव स्वारो- चिष मन्वन्तर में तुषित देवगणों के साथ तुषिता के गर्भ से उत्पन्न हुए । ओत्तम मन्वंतर मे वे तुषित नाम से जाने गये हैं। वशवर्ती देवताओं के साथ उत्पन्न होकर वे हरि वशवर्ती रूप से प्रसिद्ध होते हैं । पुनः वे सत्या के गर्भ से सत्य नामक देवगणों के साथ सत्य नाम से उत्पन्न होते हैं, तामस मन्वन्तर के आने पर वे हरि पुनः हर्य्या के गर्भ से हरि नामक देवगणो के साथ हरि रूप में ही आविर्भूत होते हैं |१३० - १३२॥ चारिष्णव मन्वन्तर के आने पर वे अजन्मा हरिदेव पुनः विकुण्ठा के गर्भ से आभूतरजस् नामक देवगणों के साथ वैकुण्ठ नाम से उत्पन्न होते हैं । चाक्षुष मन्वन्तर के आने पर वे धर्म रूप नारायण देव साध्य देवगणों के साथ साध्यरूप में उत्पन्न होते हैं | वैवस्वत मन्वन्तर के आने पर वे साध्य नारायण भगवान् मरीचिपुत्र कश्यप के संयोग से अदिति
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