चतुःपष्टितमोऽध्यायः अनन्ता नातिरिक्ताश्च सर्वे सर्गा विवस्वतः | आरोग्यायुः प्रमाणेन धर्मतः कामतोऽर्थतः ॥ एतानेव गुणानेति यः पठत्यनसूयकः वैवस्वतस्य वक्ष्यामि सांप्रतस्य महात्मनः | समासाद्व्यासतः सर्ग ब्रुवतो मे निबोधत इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते पृथुवंशानुकीर्तनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः ||६३|| अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः बैवस्त्रतसर्गवर्णनम् सूत उवाच सप्तमे त्वथ पर्याये मनोर्वैवस्वतस्य ह | मारीचारकश्यपाद्देवा जज्ञिरे परमर्षयः ५४५ ॥५५ ॥५६ ॥१ जान लेना चाहिये । वैवस्वत मनु के सभी सृष्टि कार्य आरोग्य, आयु, धर्म, अर्थ एवं काम सभी दृष्टियों से अनन्त तथा दूसरे सर्गों के समान ही है, जो असूया (गुणो में दोषारोपण करने की प्रवृत्ति) भाव को छोड़कर इसको पढता है वह आरोग्य, आयु, धर्म, अर्थ एवं काम इन सभी मनोरथों को प्राप्त करता है । अव सम्प्रति वर्तमान महात्मा वैवस्वत के सृष्टि क्रम का यथावसर और संक्षेप विस्तार में वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये ।५३-५६॥ श्री वायुमहापुराण में पृथु वंशानुकीर्तन नामक तिरसठवां अध्याय समाप्त ॥६३|| अध्याय ६४ वैवस्वत मन्वन्तर की सृष्टि का वर्णन सूतजी ने कहा - ऋषिवृन्द ! सातवें वैवस्वत नामक मन्वन्तर में मरीचि पुत्र कश्यप से देवताओं एवं महर्षियों की उत्पत्ति हुई | १ | उसमें आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण, साध्यगण, विश्वेदेवगण, मरुद्गण, भृगुपुत्र फा० - ६६
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