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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/५५६

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द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥१६२ ॥१६४ ॥१६५ ॥१६६ एवं बहुविधं वादयं श्रुत्वा राजा महामनाः । क्रोधं निगृह्य धर्मात्मा वसुधामिदमब्रवीत् एकस्यार्थाय यो हन्यादात्मनो वा परस्य वा । एकं प्रागं बहून्वाऽपि कामं तस्यास्ति पातकम् ॥१६३ यस्मिस्तु निहते भने लभन्ते बहवः सुखम् । तस्मिन्हते शुभे नास्ति पातकं चोपपातकम् सोऽहं प्रजानिमित्तं त्वां वधिण्यामि वसुंधरे | यदि से वचनं नाद्य करिष्यसि जगद्वितम् त्वां निहत्याद्य बाणेन नच्छासनपराङ्मुखीम् | आत्मानं प्रथयित्वेह धारयिष्याम्यहं प्रजाः सा त्वं वचनमासाद्य सम धर्मभृतां वरे | संजीवय प्रजा नित्यं शक्ता ह्यसि न संशयः दुहितृत्वं च मे गच्छ एवमेतं महद्वरम् | नियच्छे त्वां तु धर्मार्थ प्रयुक्तं घोरदर्शने प्रत्युवाच ततो वैन्यमेवमुक्ता सती मही । एवमेतदहं राजन्विधास्यामि न संशयः वत्सं तु मम तं यच्छ क्षरेयं येन वत्सला । समां च कुरु सर्वत्र मां त्वं धर्मभृतां वर ॥ यथा विष्यन्दमानं च क्षीरं सर्वत्र भावयेत् ॥१६७ ॥१६८ ॥१६१ तत उत्सारयामास शिलाजालानि सर्वशः । धनुष्कोटया ततो वैन्यस्तेन शैला विवधिताः ५३५ ॥१७० ॥१७१ पड़ते हैं । पृथ्वी की अनेक प्रकार की बातें सुन कर महामनस्वी धर्मात्मा राजा पृथु ने अपने क्रोध को वश में किया और पृथ्वी से कहा, जो अकेले एक व्यक्ति के लिए, वह चाहे अपने लिये हो अथवा किसी दूसरे के लिए हो, किसी एक का अथवा अनेक लोगों के प्राणों का हरण करता है हे भद्रे ! उसे घोर पातक सहन करने किन्तु हे शुभे ! यदि एक व्यक्ति के मारे जाने पर बहुतेरे लोगों को सुख मिलता है, उसके मारे जाने पर पातक क्या थोड़ा भी पातक नहीं लगता । हे वसुन्धरे ! सो मै तो इतनी सारी प्रजाओं के कल्याणार्थं तुम्हारा वध कर रहा हूँ, यदि जगत् के हित में तत्पर मेरी बातों को तू नही मानती तो अपने शासन से विमुख रहनेवाली तुझको बाणों से मारकर यहाँ अपने शरीर का विस्तार कर सारी प्रजाओं का पालन करूँगा ।१६१-१६६। हे धार्मिकों में श्रेष्ठ ! अतः तू मेरी बातों को स्वीकार कर प्रजाओं का नित्य पालन कर, तू उनके पालन करने में सशक्त है— इसमें सन्देह नही । तू मेरी कन्या बनने को स्वीकार कर ले- यही महान् वरदान तेरे लिए है । हे कठोर दिखाई पड़ने वाली ! मैं तुम्हें धर्म कार्यों में नियुक्त करने के लिए ऐसा कर रहा हूं | वेनपुत्र पृथु के ऐसा कहने पर साध्वी पृथ्वी ने कहा- हे राजन् ! आप जैसा कह रहे हैं मै वैसा हो करूंगी— इसमें सन्देह नहीं, मुझे एक बछड़ा दीजिये जिसके वात्सल्य स्नेह से मै क्षीर-प्रस्रवण करूं । हे धर्मज्ञों में श्रेष्ठ ! मुझे चारों ओर से बराबर करो, जिससे बहता हुआ मेरा क्षीर चारों ओर समरूप में प्रवाहित हो ।१६७-१७०। तदनन्तर वेनपुत्र राजा पृथु ने अपने धनुष की छोर से पृथ्वी पर फैले हुए पर्वतों को चारों ओर से हटा कर भिन्न-भिन्न स्थानों में रख दिया, जिससे उन उन स्थानों पर पर्वतों को