त्रिंशोऽध्यायः २२७ ।१७७ यदि प्रसन्नो भगवान्यदि वाऽहं तव प्रियः । यदि वtऽहमनुग्राह्यो यदि देयो वरो मम १७६ यद्दग्धं भक्षितं पीतमशितं यच्च नाशितम् । चूर्णीकृतं चापविद्धं यज्ञसंभारमीदृशम् दीर्घकालेन महता प्रयस्नेन च संचितम् । तन्न मिथ्या भवेन्महा’ वरमेतं वृणोम्यहम् ।।१७ तथाऽस्त्वित्याह भगवान्भगनेत्रहरो हरः। धर्माध्यक्ष महादेवं यज्ञे तं वै प्रजापतिः १७६ जानुभ्यानि गत्वा दक्षो लब्ध्वा भवाधरम् । नाम्नामष्टसहस्र ण स्तुतवान्वृषभध्वजम् ॥१८० दक्ष उवाच नमस्ते देवदेवेश देवारिबलसूदन । देवेन्द्र हामरश्रेष्ठ देवदानवपूजित १८१ सहस्राक्ष विरूपाक्ष त्र्यक्ष यक्षाधिपप्रिय । सर्वतःपाणिपादस्त्वं सर्वतोक्षिशिरोमुखः । सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वानावृत्य तिष्ठसि १८२ शङ्कुकर्ण महकर्ण कुम्भकर्णार्णवलय । गजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोऽस्तु ते १८३ शतोदर शतावतं शतजिव शतानन । गायन्ति त्वां गायत्रिणो ह्यर्चयन्ति तथाऽचनः ॥१८४ देवदानवगोप्ता च ब्रह्मा च त्वं शतक्रतुः। मूर्देश स्वं महमूर्ते समुद्राम्बुधराय च ।।१८५ सर्वा ह्यस्मिन्देवतास्ते गधो गोष्ठा इवाऽऽसते । शरीरं ते प्रपश्यामि सोममग्न जलेश्वरस् १८६ a ९' . : आपके प्रिय हुएअनुग्रह के पात्र और वर पाने के योग्य हुए, तो हमरी जो यीय सामग्री नष्ट हुई है, भोज्य पदार्थ खा-पी लिया गया है, नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है या बिगाड़ दिया गया है और जिसका बहुत दिनों में घोर परिश्रम करके संग्रह किया था, वह व्यथं न जाय । यही वर चाहते हैं १७६१७ ८॥ भग के नेत्र को हरण करने वाले महादेव ने कहा—ऐसा ही हो । इस प्रकार महादेव से वर प्राप्त कर दक्ष प्रजापति घुटने के बल जमीन पर बैठ गये त्रिनयन, धर्माध्यक्ष, वृषभध्वज महादेव की स्तुति और उन्होंने आठ हजार नामों से की ।१७६-१८०। । दक्ष बोले-देव-देवेश ! आपको नमस्कार है । आप देबार्विलसूदन, देवेन्द्र, अमरश्रेष्ठ, देवदानव- पूजित, सहस्राक्ष, विरूपाक्ष, त्रिनयन, यक्षाधिपप्रिय, सर्वत्र अक्षिशिरोमुख, सर्वत्र श्रुतिमान् और सम्पूर्ण संसार को आप ढंके हुए हैं ।१८१-१८२। शङ्कुकर्ण ! आप महाकणं, कुम्भकर्ण, समुद्रवासी, गजेन्द्रकणं, गोकर्ण , ओर पाणिकर्ण है, आपको नमस्कार है ।१८३। हे शतोदर ! शतजिह्न और शताननगय- शतावर्त, , त्रीजपकर्ता आपकी स्तुतिं का गान करते है और पूजक आपकी पूजा करते हैं ।१८४। आप देवदानवों के पालयिता, ब्रह्मा, इन्द्र, मूर्तीश; महामृति और समुद्राम्बुधर हैं ।१८५। गोष्ठ में जैसे गोगण रहते है, प्रकार उसी देवगण आप में ही अवस्थित हैं । सोम, अग्नि, जलेश्वर, आदित्य, विष्णु, ब्रह्मा और वृहस् आपके शरीर
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