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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/१६७

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१४८ ॥ ८८ भूर्लोकः प्रथमः पादो भुवर्लोकस्ततः परम् ।) स्वर्लोको हि तृतीयस्तु चतुर्थस्तु महः स्मृतः तत्र लोकः परं स्थानं परं तद्योगिनां स्मृतम् ८६ निर्ममा निरहंकारः कामक्रोधविज्जताः । द्रक्ष्यन्ते तद्विदो युक्ता ध्यानतत्परयुञ्जकः l८७ यस्माच्चतुष्पदा ह्यषा त्वया दृष्टा सरस्वती । तस्माच्च पशवः सर्वे भविष्यन्ति चतुष्पदः ।। तस्माच्चैषां भविष्यन्ति चत्वारो वै पयोधरः सोमश्च मन्त्रसंयुक्तं तस्मान्मम मुखाच्च्युतः । जीवः प्राणभृतां ब्रह्मन्सर्वः पीत्वा स्तनैशृतम् ॥८६ तस्मात्सोममयं चैतदमृतं चैव संज्ञितम् । चतुष्पादा भविष्यन्ति श्वेतत्वं चास्य तेन तत् &० यस्माच्चैवं क्रिया भूत्वा द्विपादा वै महेश्वरी । दृष्टा पुनस्त्वया चैषा सावित्री लोकभाविनी । तस्माद्वै द्विपदाः सर्वे द्विस्तनश्च नराः स्मृताः ॥६१ यस्माच्चैवमजा भूत्व सर्ववर्णा महेश्वरी । दृष्टा त्वया महासत्त्वा सर्वभूतधरा परा ॥६२ तस्मात्तु विश्वरूपत्वमजानां वै भविष्यति । अजश्चैव महातेजा विश्वरूपो भविष्यति ॥६३ अमोघरेताः सर्वत्र मुखे चास्य हुताशनः । *तस्मात्सर्वगतो मेध्यः पशुरूपी हुताशनः ॥४ तपसा भावितात्मानो ये वै द्रक्ष्यन्ति वै द्विजाः । ईशत्वे च शिवत्वे च सर्वगं सर्वतः स्थिरम् ॥e५ रजस्तमोविनिर्मुक्तास्त्यक्त्वा मनुष्यकं भुवि । तत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥६६ द्वारा प्राप्य है ।८६जो निर्मम, निरहङ्कार काम क्रधन्हीनं, ध्याननिष्ठ योगी हैं. वे ही उस लोक का अवलोकन कर सकते है । जिसलिये आपने चार पैर वाली सरस्वती का साक्षात्कार किया है, इसी से आपके सव पशु चार पैर थाले होगे । इसी से उनके स्तन भी चार ही होगे । ब्रह्मन् ! सभी प्राणियो का प्राणस्वरूप मेश्रमय सोस हमारे मुख से च्युत हुआ है इसी से जीवधारियो ने ठसे पीकर स्तनो मे धारण किय । इसी से सोममय और अमृत भी है वह कहलाता है। सम का वर्ण श्वेत होता और उसके चार पाद होते है |-९०। जिस कारण आपने लोकभाविनी महेश्वरी सावित्री को दो पैरों वाली देखा है, उसी प्रकार आपके द्वारा सृष्ट नरगण द्विपद और दो स्तन वाले होंगे ।९१। जो सर्ववर्णा, सवंभूतधारिणी, महासत्वशालिनी परम, जन्मरहित माहेश्वरी देवी है, उनका आपने साक्षात्कार किया है, इसलिये अन्य देवगण विश्वरूप होणे ओर महातेजस्वी अज भी। विश्वरूप धारण करेगे 18२-९३। इनके मुख में अमोघरेता हुताशन रहेगे, इसलिये पशु रूपी हुताशन सर्वगत ओर मेध्य होगे । जो तपस्वी द्विज हमें सर्वगामी ईश्वर शिव रूप में देखेंगे, वे रज और तमोगुण से मुक्त होकर मानव शरीर को छोड़ने के बाद हमारे समीप आवेगे, जहां से कि वे फिर

  • इदमर्घ नास्ति घ. ड. पुस्तकयोः ।