अष्टादशोऽध्यायः ११७ ततीरति निर्देशं कृच्छंस्यन्ते संमहृितः । पुनराश्रममगस्य चरेद्भिक्षुरतन्द्रितः । नं म(न)संयुक्तं वंचनं हिनस्तीति मनीषिणः । तथाऽपि च न कर्तव्यः प्रसङ्ग झषं दारुणंः ॥१० अंहोरात्राधिकः कश्चिन्नास्त्यधर्म इति श्रुतिः । हिंसा है या परा सृष्टा दैवतैर्मुनिभिस्तथा ११ यदेतद्रविणं नाम प्राणा होते बहिश्वराः। स तस्य हरति प्राणान्यो यस्य हरते धनम् १२ एवं कृत्वा स दुष्टात्मा भिन्नवृतौ व्रताच्च्युतः । भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेच्चान्द्रायणं व्रतम् ॥१३ विधिना शास्त्रदृष्टेन संवत्सरमिति अतिः । ततः संवत्सरस्यान्ते भूयः प्रक्षीणकल्मषः १४ भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेद्भिक्षुरतन्द्रितः । अहसा सर्वभूतानां कर्मणा मनसा गिरा ॥१५ अकामादपि हिंसेत यदि भिक्षुः पशून्मृगान् । कृच्छातिकृच्छ कुर्वीत चान्द्रायणमथापि वा ॥१६ स्कन्देदिन्द्रियदौर्बल्यात्स्त्रियं दृष्ट्वा यतिर्यदि । तेन धारयितव्या वै प्राणायामास्तु षोडश ॥१७ दिवा स्कन्नस्य विप्रस्य प्रायश्चित्तं विधीयते । (अत्रिरात्रमुपवासश्च प्राणायामशतं तथा १८ रात्रौ स्कन्नः शुचिः स्नातो द्वादशैव तु धारणः । प्राणायामेन शुद्धात्मा विरजा जायते द्विजः ॥१६ के साथ सान्तपन करे और उक्त कृच्छ व्रताचरण के अनन्तर वह अपने आश्रम में प्रवेश करे’ एवं सावधान होकर भिक्षे केरे -e। -परिहास के समय अंसत्य बोलने से कोई दोष नहीं होता है; -किन्तु ऐसा नहीं करना चाहिये क्योकि ऐसा प्रसङ्ग ही भयङ्कर होता है ।१०। दिन-रात में अधिक से अधिक एक आधअक्षर परिहास मे कहा गया असत्य अधमे नही है ऐसा श्रुति कहती है; देवता और किन्तु मुनियों ने हिंसा को सब से बड़ा पाप कहा है, यही वेद भी कहते हैं ।११। सारांश यह कि हिंसा सब पापों से बढ़कर' है । धेन ” लोगों के बहिर्गात प्राण है; “इसलिये "जो धन को हरणं न करता है; वह उसके प्राण का हरण करतां ‘इन' अपर्कम है । को करने वालो दुष्टात्मा भिक्षुक र व्रत से च्युत हो जाता और क्लेश प्रप्त केता है । ऐसा भिक्षुक 'शास्त्रविधि" से संवत्सर ‘पर्यन्त चान्द्रायण नेत करे। यही "भृति 'कहती है । संवत्सर के अन्तं मे निष्पंप होकर भी “वह "व्येथित 'चित्त से सावधान "होकरं भिक्षाचरण करे ।१२-१४३। मन, वचन और कर्म से संब जीवो के लिये ‘अंहसा 'धारण करनी चाहिये - अगर विना किसी’ अभिलषा 'के भी 'भिं मृगादि पशुओं' की हिंसा भी कर • , तो उसे 'कठिन-से-कठिन चान्द्रायण करना चाहिये ।१५-६ इन्द्रिय दीर्बल्य के कारण यदि स्त्री दर्शन से ही यति का वीर्यपात हो जाय तो उसे षोडश प्राणायाम करना चाहिये ।१७अगर ब्राह्मण का दिन में वीर्यपात हो जाय, तो इसके लिए प्रायश्चित यह है कि, वह तीन रात ‘उपवास कर सौ प्राणायाम कर, रात में -वीर्यगात करने से स्नान के बाद बारह वार प्राणायाम करे । प्राणायाम के द्वारा ब्राह्मण शुद्ध और निष्पाप हो जाता है ।१८-१९। बिना धनुश्चिह्न्तर्गतग्रन्थो घ. पुस्तके नास्ति ।
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