१०० वायुपुराणेषु ।।३३ परित्यजति यो बुद्धचा स परं प्राप्नुयाद्द्विजः । दृश्यते हि महात्मान ऋषयो दिव्यचक्षुषः ॥३० संसक्ताः सूक्ष्मभावेषु ते दोषास्तेषु संज्ञिताः । तस्मान्न निश्चयः कार्यः सूक्ष्मे ष्विह कदाचन ॥३१ ऐश्वर्याज्जायते रागे विरागं ब्रह्म चोच्यते । विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम् प्रधानं विनियोगज्ञः परं ब्रह्माधिगच्छति ३२ सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः । अनन्तशक्तिश्च विभोविधिज्ञाः षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य । नित्यं ब्रह्मधनो युक्त उपसर्गाः प्रमुच्यते । जितश्वासोपसर्गस्य जितरागस्य योगिनः ३४ एका बहिः शरीरेऽस्मिन्धारणा सार्वकामिकी । विशेद्यदा द्विजो युक्तो यत्र यत्रार्पयेन्मनः ॥३५ भूतान्याविशते वाऽपि त्रैलोक्यं चापि कम्पयेत् । एतया प्रविशेद्देहं हित्वा देहं पुनस्त्विह ॥३६ मनो द्वारं हि योगानामादित्यं च विनिदशेत् । आदानादिक्रियाणां तु आदित्य इति चोच्यते ॥३७ एतेन विधिना योगी विरक्तः सूक्ष्मजतः । प्रकृति समतिक्रम्य रुद्रलोके महीयते ३८ (*ऐश्वर्यगुणसंप्राप्तं ब्रह्मभूतं तु तं प्रभुम् । देवस्थानेषु सर्वेषु सर्वतस्तु निवर्तते) ॥३६ करते है । ऐसा देखा गय' है कि, दिव्य चक्षु महात्मा ऋषिगण भी सूक्ष्म भावसमूह में लिप्त होने के कारण दोष-दुष्ट हो गये है । इसलिये सूक्ष्म भावसमूह मे एकान्त निष्ठावान् नहीं होना चाहिये । ऐश्वर्य से राग उत्पन्न होता है और विराग का ही नाम ब्रह्म है । इन सप्त सूक्ष्म तत्त्वों को और षडंग महेश्वर को जान कर जो योगी क्रिया-कलाप में पटु होते है, वे ही परब्रह्म को प्राप्त करते हैं ।-३२ विधि तत्त्व को जानने वाले व्यक्तियों ने प्रभु महेश्वर के षडङ्ग तस्व को इस प्रकार बताया है, सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि बुद्धि, स्वतन्त्रता नियत अविनश्वर शक्ति और अनन्त शक्ति ।३३। जो योगो परब्रह्म को ही नित्य धन समझने लगते हैं, उनके सभी उपसर्ग शान्त हो जाते है । जिसने राग और प्राणायाम जनित उपसर्गों को जीत लिया है, उसके लिये वहिः शरीर में सर्वकार्य-साधिका एकमात्र धारणा हो विहित है। योगी जहां-जहां जिस भूत विशेष में मन को लगाते है, वहाँ वे प्रवेश कर जाते है ३४-३५। वे तीनों लोकों को भी कपा सकते हैं । वे देह छोड़ कर दूसरी देह मे भी प्रवेश कर सकते है । सब योगों का द्वार मन है । आदित्य को भी योग का द्वार कहते है । ये इन्द्रियो का आदान करते है अर्थात् इन्द्रिय-वृत्ति समूह का आकर्षण करते है, इससे वे आदित्य कहलाते हैं ।३६-७॥ इस विधि से योगी विषय से विरक्त होकर, सूक्ष्म तत्वों को त्याग कर और प्रकृति का अतिक्रमण करके रुद्र लोक में निवास पाता है ।३८। ऐश्वर्य गुण से संयुक्त होने पर योगी ब्रह्मत्व प्राप्त करता है। तब वे संपूर्ण
- धनुश्चिढ्तर्गतग्रन्थो घ. पुस्तके नास्ति ।