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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/११५०

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एकादशाधिकशततमौऽष्यायं हेत्यसुरस्य यच्छोर्षं गदया तद्विधा कृतम् । ततः प्रक्षालिता यस्मातीर्थं तच्च विमुक्तये ॥ गदालोलमिति ख्यातं सर्वेषामुत्तमोत्तमम् गदालोले महातीर्थे गदाप्रक्षालनाद्धरेः । स्नानं करोमि सिद्धयर्थमक्षयं पदमाप्नुयाम् पश्वमेऽह्नि गदालोले स्नात्वा कुर्यात्सपिण्डकम् । श्राद्धं पितॄन्ब्रह्मलोकं नयेदात्मानमेव च ब्रह्मप्रकल्पितान्विप्रान्हव्यकव्यादिना + र्चयेत् । तैस्तुष्टैस्तोषिताः सर्वाः पितृभिः सह देवताः कृते श्राद्धेऽक्षयवटे अन्नेनैव प्रयत्नतः । पितृन्नयेद्ब्रह्मलोकमक्षयं तु सनातनम् वटवृक्षसमोपे तु शाकेनाप्युदकेन वा । एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवन्ति भोजिताः देयं दानं षोडशकं गयातीर्थंपुरोधसे | वस्त्रं गन्धादिभिः पुत्रैः सम्यक्संपूज्य यत्नतः : ११२८ - इत उत्तरं क पुस्तकटिपण्यामधिकं श्लोकद्वयमस्ति तद्यथा- गयातीर्थवटे चैव पितॄणां दत्तमक्षयम् । दृष्ट्वा नत्वा च संपूज्य वटेशं सुसमाहितः || पितॄन्नयेद्ब्रह्मलोकमक्षयं तु सनातनम् ॥१ गयायां धर्मपृष्ठे च सरसि ब्रह्मणस्तथा । गयाशीर्षे वटे चैव पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥ इति ॥ २ फा०-१४२ ॥७६ ॥७७ ॥७८ ॥७६ ॥८० ॥८१ ॥८२ भागों में विभक्त हो गया था, वहीं पर विष्णु ने गदा को घोया था, यही कारण है कि वह तीर्थ पित को मुक्ति के लिए विशेष ख्यात है। सभी उत्तम तीर्थों में भी वह उत्तम है, उसका नाम गदा लोल कहा जाता है ।७४-७६। उस गदालोल नामक महातीर्थ में भगवान् विष्णु की गदा धोने से ही यह माहात्म्य है । वहाँ पर स्नान करते समय यह संकल्प करे- इस परम पुनीत गदालोल तीर्थ में मैं सिद्धि प्राप्ति की कामना से स्नान कर रहा हूँ, मुझे अक्षय पद की प्राप्ति हो । इस प्रकार पाँचवे दिन गदालोल नामक तीर्थ में स्नान कर सपिण्ड श्राद्ध करनेवाला अपने साथ अपने समस्त पितरों को भी ब्रह्मलोक पहुँचाता है। श्राद्ध के उपरान्त ब्रह्मकल्पित ब्राह्मणों को हव्य कव्यादि सामग्रियो से सन्तुष्ट करे | क्योंकि उनके सन्तुष्ट होने से ही सब पितर एवं देवगण सन्तुष्ट होते है |७७-७६॥ अक्षयवट तीर्थ में अन्न द्वारा विधिपूर्वक श्राद्ध करने वाला अपने पितर गणों को अक्षय एवं सनातन ब्रह्मलोक को पहुँचाता है | वटवृक्ष के समीप शाक, अथवा जल द्वारा भी यदि एक विप्र को भोजन करा दिया जाय तो उससे कोटि ब्राह्मणों को भोजन किया हुआ समझना चाहिये । गयातीर्थ के पुरोहितों को सोलह प्रकार का दान देना चाहिये, वस्र एवं सुगन्ध आदि सामग्रियों द्वारा पुत्रों समेत विधिपूर्वक उनकी पूजा करके दान देना चाहिये १८०-८२ | इस चराचर जगत् के एक महासमुद्र के रूप में