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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/१०४२

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एकशततमोऽध्यायः सर्वर्तुकुसुमां मालां जिप्रमाणोरसि स्थिताम् | नीलोत्पलदलश्यामं पृथुताम्रायतेक्षणम् ईषत्कराललम्बोष्ठं तीक्ष्णदंष्ट्रागणाञ्चितम् । षडूर्ध्वनेत्रं दुष्प्रेक्ष्यं रुचिरं चोरवाससम् आहवेष्वपरिक्लिष्टं देवानासरिनाशनस् | बाहुना बाहुमावेश्य पार्श्वे सव्येऽन्तरे स्थितम् रराज पट्टिशं तस्य वामाग्रकरगोचरम् | महाभैरवनिर्घोषं बलेनाप्रतिमौजसम् || दशवर्णधनुश्चैव विचित्रं शोभतेऽधिकम् त्रिशूलं विद्युताभासममोघं शत्रुनाशनम् । जाज्वल्यमानं वपुषा परसं तत्विषा युतम् असिश्चैबौजसां श्रेष्ठः शीतरश्मिः शशी तथा | तेजसा वपुषा कान्त्या देवेशस्य महात्मनः शुशुभेऽभ्यधिकं तत्र वेद्यामग्निशिखा इव स्थितः पुरस्ताद्देवस्य शातकौम्भमयो महान् । शुशुभे रुचिरः श्रीमान्सोदकः सः कमण्डलुः १०२१ ॥२६७ ॥२६८ ॥२६६ ।२७० ॥२७१ ॥२७२ ॥२७३ भयानक होते हैं, खम्मे के समान विशाल एवं भोषण दाँतों से उनके मुख की एक विकट शोभा होती है | ये गण विमानों में चढ़कर तन्मय होकर भगवान् की वन्दना एवं पूजा करते हैं । उस समय महादेव जी सभी ऋतुओं में सुलभ पुष्पों से निर्मित माला को, जो उनके विशाल वक्षःस्थल पर शोभा वृद्धि करती है, सूंघते हैं । वे नीले कमल दल के समान श्यामल वर्णं है, लम्बे-लम्बे लाल वर्ण के उनके मनोहर नेत्र हैं। कुछ भयानक और लम्बे होंठ, तोक्ष्ण दंत पंक्तियों से सुशोभित हैं, ऊपर को ताकने वाले भयानक नेत्र से उनका मुखमण्डल दुष्प्रेक्ष्य होता है । सुन्दर चीर वस्त्र धारण किये रहते हैं | २६३ - २६८। युद्धों में जिसे कोई कठिनाई नहीं होती, ऐसे राक्षसों के परम विध्वंसक एक हाथ को वे दूसरे हाथ में लपेट कर वामपार्श्व में रख लेते हैं। उससे थोड़ी ही दूर पर स्थित उनके नाम हाथ में सुशोभित पट्टिण नामक अस्त्र शोभा पाता में है, उसके अतिरिक्त जिसकी प्रत्यञ्चा का निनाद महान् भीषण होता है, जिसके समान दृढ़ एवं तेजस्वी कोई अन्य धनुष नही है, उनका दसवर्णो वाला विचित्र धनुष भी वहाँ अधिकाधिक शोभा लाभ करता है |२६६-२७०१ विद्युत् के समान चमकीला पात्रुसंहारकारी उनका त्रिशूल भी वहाँ अपनी जाज्वल्यमान कान्ति से परम शोभा प्राप्त करता है । उस त्रिशूल का लक्ष्य कभी विफल होने वाला नहीं है। देवाधिदेव महान् पराक्रमशाली भगवान् के समीप परम तेजोमय तलवार एवं शीतलरश्मि चन्द्रमा सुशोभित है | अपने तेज शरीर एवं कान्ति से वे वेदी में अग्नि की ज्वाला की तरह अधिक सुशोभित होते हैं । देव के सम्मुख सुवर्णमय, महान् कमण्डलु जल समेत विराजमान है, उसकी शोभा को एक निराली छटा रहती है। अपने अंग में तलवार लटकाये हुये, पीले रंग का वस्त्र धारण किये, वक्षःस्थल पर एक विशाल मुक्ता की माला धारण + अत्र संघिराषः |