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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/१०३९

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१०१८ वायुपुराणम् सौकुमारेण रूपेण गन्धिनाप्रतिमेन च । तत्र दिव्यानि पद्मानि वनेषूपवनेषु च भृङ्गपत्रनिकाशानि तपनीयानि यानि च । अर्धकृष्णार्धरक्तानि सुकुमारान्तराणि च आतपन्नप्रमाणानि पङ्कजैः संवृतानि च । भूयः सप्त सहानद्यास्तासां नामानि वोधत जरा वरेण्या वरदा वरार्हा वरवणिनी | वरमा वरभद्रा च रम्यास्तस्मिन्पुरोत्तमे पद्मात्पलदलोन्सिश्रं फेनाद्यादर्तविग्रहम् । जलं मणिदलप्रख्यमावहन्ति सरिद्वराः न तु ब्रह्मर्षयो देवा नासुराः पितरस्तथा । न खल्वन्धेऽप्रमेयस्य विदुरीशस्य तत्पुरम् तत्र ये ध्यानभव्यग्राः सुयुक्ता विजितेन्द्रियाः | पश्यन्तीह महात्मानः पुरं तद्गोवृषात्मनः मध्ये पुरवरेन्द्रस्य तस्यासमिततेजसा । सुमहान्मेरुसंकाशो दिव्यो भद्रश्रिया वृतः सहस्रपाद: प्रासादस्तपनीयमयः शुभः | अनुपमेयै रत्नेश्च सर्वतः स विभूषितः स्फटिकैश्चन्द्रसंकाशवेंदूर्यैः सोमसंप्रभः | बालसूर्यप्रभश्चैव सौवर्णैश्चाग्निसंप्रभः राजतैश्चापि शुशुभे इन्द्रनीलमयैः शुभैः । दृढैर्वज्ञमयैश्चैव इत्येवं सुरुमाहितैः ॥२४० ॥२४१ ||२४२ ॥२४३ ॥२४४ ॥२४५ ॥२४६ ॥२४७ ॥२४८ ॥२४६ ।।२५० सुकुमारता, सौन्दर्य, एवं सुगन्ध मे अनुपम है | ऐसे परम मनोहर दिव्य पद्म वहाँ के वनों एवं उपदनों में सर्वत्र है । वहाँ कुछ सुन्दर परम सुकुमार पद्म भृङ्ग के पंख के समान श्यामल वर्ण के, कुछ एकदम सुनहले, कुछ आधे काले आधे लाल, आकार मे छत्र के समान होते हैं। ऐसे सुन्दर पद्मों से वहाँ के जलाशय व्याप्त है । वहाँ सात महानदियाँ है, उनके नाम वरा, वरेण्या वरदा, वरा, वरवणमी, वरमा, वरभद्रा, है | वे परम रमणीय नदियां उस सुन्दरपुरी की शोभा वृद्धि करनेवाली है |२३८- २४३। इन सुन्दर सरिताओं में श्वेत, रक्त पद्मों के दलों से विमिश्रित, फेनों एवं भंवरियों से विभूषित मणियों के टुकड़ो के समान परम स्वच्छ शुभ्र जल प्रवाहित होता है । अप्रमेय महेश्वर के इस परम रम्यपुर को न तो ब्रह्मर्षिगण हो जानते है, न देवता ही जानते है । असुरों एवं पितरो को इस पुर का कोई पता नही है । जो परम जितेन्द्रिय योगाभ्यास परायण महात्मा हैं, जिनका चित्त कभी चंचल वा व्यग्र नही होता, वे ही ध्यान घर कर वृषभध्वज के इस पुर का दर्शन करते है ।२४४- २४६। उस पुरवर के मध्य भाग मे अनुपम तेजस्वी, महान्, सुमेरु पर्वत के समान विशाल, समग्र सौन्दर्यश्री से विभूषित एक प्रासाद सुशोभित है, जिसके सहस्र चरण हैं, उस मङ्गलमय प्रासाद को रचना सुवर्ण से है | सभी ओर से अमूल्य अनुपम रत्नो द्वारा उसकी शोभा वृद्धि होती है। कहीं शुभ्र स्फटिक मणियो से, कही चन्द्रकान्त मणियों से, कही वैदूर्य मणियों से, कही चन्द्रमा के समान सुशोभित मणियो से, वही प्रातः कालीन सूर्य की भांति परम मनोहर किन्तु तेजोमय मणियो से, कही सुवर्णमय मणियों से, कही अग्नि के समान तेजोमय