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पृष्ठम्:वायुपुराणम्.djvu/१०२५

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१००४ वायुपुराणम् तच्छ्रुत्वा तु ते सर्वे नैमिषेयास्तपस्विनः | बाष्पपर्याकुलाक्षास्तु प्रहर्षाद्गद्गदस्वराः पप्रच्छुर्मातरिश्वानं सर्वे ते ब्रह्मवादिनः । ब्रह्मलोकस्तु भगवन्यावन्मात्रान्तरः प्रभो योजनाग्रेण संख्यातं साधनं योजनस्य तु | फ्रोशस्य च परीमाणं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सातरिश्वा विनोतवाक् | उवाच मधुरं वाक्यं यथादृष्टं यथाक्रमम् वायुरुवाच एतद्वोऽहं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मे विवक्षितम् । अव्यक्ताद्वयक्तभागो वै महास्थूलो विभाव्यते दशैव महतां भागा भूतादि: स्थूल उच्यते । दशभागाधिकं चापि भूतादेः परमाणुकः परमाणुः सुसूक्ष्मस्तु भावाग्राह्यो न चक्षुषा । यदभेद्यतमं लोके विज्ञेयं परमाणु तत् जालान्तरगते भानौ यत्सुक्ष्मं दृश्यते रजः । प्रथमं तत्प्रमाणानां परमाणुं प्रचक्षते

  • अष्टानां परमाणूनां समवायो यदा भवेत् । त्रसरेणुः समाख्यातस्तत्पद्मरज उच्यते

॥१११ ॥११२ ॥११३ ॥११४ ॥११५ ॥११६ ॥११७ ॥११८ ॥११६ घायु की इन बातों को सुनकर ब्रह्मवेत्ता नैमिपारण्य निवासी महर्षिगण अतिशय हर्ष से आनन्दाश्रु बहाने लगे, उनके कण्ठ गद् गद हो गये । उन सभी ब्रह्मवेत्ताओं ने मातरिश्वा से पूछा | भगवन् वायु देव | उक्त ब्रह्म लोक जितनी दूरी पर अवस्थित है, इसकी दूरी जितने योजनों एवं कोसों में है, एवं उन योजनों और फोसों की परिभाषा क्या है— इन सब बातों को हम सब को जिज्ञासा, हो रही है, इनको यथार्थतः जानकारी हमें कराइये । महर्षियों की इस वाणी को सुनकर घायु ने मीठे विनीतस्वर में उक्त ब्रह्मलोक के बारे में जो कुछ देखा या सुना था, क्रमानुसार बतलाना प्रारम्भ किया ११११-११४। वायु बोले – ऋषिवृन्द ! आप लोगों का अन्यान्य वक्तव्य विषयों को बतला रहा हूँ, सुनिये | अव्यक्त की अपेक्षा व्यक्त भाग महा स्थूल बतलाया जाता है । महत् के दस भाग जितना स्थूल भुवादि बतलाये जाते है, भूतादि से दस भाग अधिक स्थूल परमाणु कहा जाता है यह परमाणु भी अतिशय सूक्ष्म होता है, इसे केवल अनुभव द्वारा हो जाना जा सकता है | आँखों द्वारा नहीं । लोक में जो सब से सूक्ष्म परम अभेद्य वस्तु होती है, उसी को परमाणु जानना चाहिये । जालियों के भीतर घुसकर ( कमरे के अन्दर ) आने वाली सूर्य की किरणो में जो अति सूक्ष्म धूल के कण दिखलाई पड़ते हैं, वही प्रमाणों में सर्व प्रथम परमाणु कहे जाते है ।११५ -११८॥ ऐसे आठ परमाणुओं का जब समवाय ( मिलन ) होता है, तब उसे त्रसरेणु कहा जाता है, इसे पद्मरज भी कहा जाता है | ऐसे आठ त्रसरेणुओं के मेल से रथरेण बनता है वे

  • नास्त्ययं श्लोकः ख. घ. पुस्तकयो:।