( २९८ ) श्रथ मन्त्राध्यायो नाम द्वाविंशः (ङ) कालस्य परिछेदः विना यतो शक्यः | संक्षिप्तं स्पष्टार्थ यंत्राध्यायं ततो वक्ष्ये ॥ १ ॥ सप्तदशकाल यंत्राण्यतो धनुस्तुर्यगोलकश्चक्रम् | यष्टिकुर्घटिका कपालकं कर्त्तरिकोटम् ॥ २ ॥ सलिल भ्रमोवलंब करछाया दिनार्द्धमोक्षः । नवकाल ज्ञानायें तेषां संसाधानान्यष्टौ ॥ ३ ॥ ४ १. (घ) १. विना (ग) (च) (ङ) for (विना) (ग) २. गोलस्य (ङ) for (कालस्य ) ३. यतोऽशक्यः (ङ) for ( यतोशक्यः) (वि०~-~इसकी श्लोक संख्या ४ है) (वि० - इलोक संख्या ४ है इसके पूर्ववर्ती तीन श्लोकों को गोलाध्याय के अंत में रख दिया गया है) ४. परिछेद: for (परिछेद) २. (घ) १. वटिका for (घंटिका) २. कतैरी (ग) (च) (ङ) for (कतरि ) ३. फीटं (ग) पीठम् for (कीटम्) (ग) ४. गोलकं चक्रम् for (गोलतश्चक्रम् ) ५. पष्टि: (च) (ङ) for (यष्टि) (वि० -- इसकी श्लोक संख्या ५ है) (च) ३. फीटा for (कीटम्) (ङ) ३. पीठम् for (कीटम्) wwwLAPAN २. वमो for ( भ्रम) ३. (ग ) १. सलिलं (ङ) for (सलिल) ३. कराया (ङ) for (कछाया ) ४. नय for (नव ) ५. यहां अनुस्वारलुप्त है । (वि० --- इसकी श्लोक संख्या ६ है) (च) २. डवलंब: for (बलंब:) २. अमोऽवलम्ब for (अमोवलंब :) ..मऽक्षः for (मकक्षः) ६. मकक्ष for (मश:) Y ४. नत for ( नव )
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