( २६७ ) यत्स्पष्टोकरणाद्यं गोलादुत्क्षेपतत्कृतं सर्वं गोलाध्यायः । सप्तत्यार्यारंगामेक विशोयम् ॥ ७० ॥ ४ मध्याद्यमिह यदुक्त तत्प्रत्यक्षमिव दर्शयति यस्मात् । तस्मादाचार्यत्वं गोलविदो भवति नान्यस्य ॥ ७९ ॥ आचार्येण ज्ञातः श्रीषेणार्यभटविष्णुचंद्राद्यैः । २ ४ 3 गोले यस्मात्तस्माद् ब्राह्म गोलः कृतः स्पष्टः ॥ ७२ ॥ गरिगतज्ञो गोलज्ञो गोलज्ञो ग्रहगति विजानाति । यो गरिणतगोलबाह्यो जानाति ग्रहगति सः कथम् ॥ ७३ ॥ इति ब्रह्मगुप्ते गोलाध्याय: (२१ अध्यायः समाप्त :) एक विंशतितमः समाप्तः ७०. (घ) १. दुमक्ष (ग) प्रेक्ष्य (ङ ) for (दुत्क्षेप) २. (वि० -- यह दूसरी पंक्ति का प्रारम्भिक शब्द है ) (ग) (ङ) (ग) ३. सर्वां for ( सर्व ) ४. समाप्ति सूचक ॥ छः ॥ ॥छः। ॥छ। (च) १. दुत्प्रेक्षतत्कृतं for (दुरक्षेपतत्कृतं ) (ङ) ७३. (घ) NAN + इति श्री ब्राह्मस्फुट सिद्धान्ते गोलाध्यायो नामकविशतितमो ऽध्यायः + ( वि० -- वस्तुतः गोलाऽध्याय यहां ७० वें श्लोक पर समाप्त हो गया है । परन्तु उपर्युक्त प्रति में यन्त्राध्याय के पहले तीन श्लोक मिलाकर ७३ पर समाप्त किया है) ७१. (घ) १. गोलो भवति for (गोलविदो भवति ) ( वि० - इसकी क्रमसंख्या १ है) (ङ) वि० - यह 'यन्त्राध्याय का प्रथम श्लोक है) ७२. (घ) १. आचार्य (ङ) fox (आचार्येण ) (ग) २. शाता for (ज्ञात:) ३. 'विष्णु' पद लुप्त है। ४. गोलो (ङ ) (च) for (गोले ) ५. ब्राह्मो (ङ) for ( ब्राह्म ) (वि० -- इसकी क्रमसंख्या २ है) १. प्राचार्ये for (आचार्येण ) (ङ) (वि० – यह यन्त्राध्याय का द्वितीय श्लोक है) १. इति भह जिष्णुसुतब्रह्मगुप्त विरचित्रे ब्रह्मस्फुट सिद्धांतो गोलाध्यायः एक विशतितमः | for ( इति ब्रह्मगुप्ते गोलाघ्याय:) (ग) २. ग्रहति for (ग्रहगति) ३. स (ङ) (च) for (स:) .* १. ये पद लुप्त है (वि० - इसकी क्रमस ख्या ३ है) - (च) १. इति भट्ट जिष्gसुत ब्रह्मगुप्त विरचिते ब्राह्म स्फुटसिद्धांतो गोलाध्यायः एक विशतितमः for ( इति ब्रह्मगुप्ते गोलाध्यायः २१ अध्यायः समाप्तः) (वि० -- यह यन्त्राध्यायः का तीसरा श्लोक है ) (ङ)
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