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पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त भाग १.pdf/६४४

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( २५७ ) शशिलिप्ता शेषकृतिद्विनवति गुरिणता अशिति गुणितं वा । सैकाज्ञ दिने वर्ग कुर्वन्नावज्ञ्पराव गुणकः ॥ ७१ ।। इष्टभगरगादि शेषं द्विनबत्यूनं व्यशिति संगुरिणतम् | रुपेरण युतेन वर्ग कुर्वन्नावत्सराद् गरगकः ॥ ७२ ।। भगरगादिशेषवर्ग चतुर्गुरगं पंचषष्टिसंयुक्तम् । षष्ट्यूनं वा वर्ग कुर्वन्नावरसराइ गरणकः ॥ ७३३॥ १ (गुणितं) ७१. (घ) १. कृतिः (ग) कृति for (कृति) ( वि० - इसकी क्रम संख्या ७२ है) २. प्रशीति (ग ) व्यशीति for (अशिति) ३. गुरिषतां: ४. कुर्वश्नावत्सराद्गणकः (ग) for (कुर्वन्नावश्परा दुगणकः) (ग) ५. द्विनवगुणितं for ( द्विनवतिमुशिता ) ६. सैकं for ( सैक) ७. वर्गे for ( वर्ग ) वि० – इसके आगे “गुणित वा । सैकश दिने व कुर्वन्ना० || ७५ ॥ लिखा है । (च) १. कृति: for (कृति) ५. द्विनवति गुरितां for (द्विनवतिगुणिता) ३. गुणितां वा for (गुणितं वा) ७३. (घ) २. अशीति for (अशिति) ४. कुर्वन्नावत्सरादुगणुकः for (कुर्वन्नावश्परादुगणकः) (वि० -- यहाँ क्रमसंख्या ७२ है) वि यह श्लोक इस प्रति में उपलब्ध नहीं है । ( वि० -- इसकी क्रमसंख्या ७३ है) १. व्यशीति (ग) व्यशीति for (व्यशिति) २. युतं (ग ) (ङ) for ( युतेन ) (ग) ३. वग्रॅ for (वर्ग) (च) १, त्र्यशीति for (व्यशिति) २. युतं for युतेन ४. (वि० - क्रम संख्या ७३ अंकित है ) १. व्यशीति for (ञ्चशिति ) (ङ) B (वि० - इसकी श्लोकसंख्या ७७ हैं) - (वि०-- इसको क्रम संख्या ७४ है) यह श्लोक १९०२ में बनारस से मुद्रित प्रति में ७८ संख्या पर हैं (T) (वि० - यह श्लोक 'ग' में उपलब्ध नहीं है) (वि० - क्रमसंख्या ७४ अंक है) (वि० -- इसकी क्रमसंख्या ७८ अंकित है)