२४२ येन गुरणे शेषपुते छेदः शुध्यति हत स्वगुरणकेन । ५ 8 (ग) तद्भेक्त शेषं फलमेव शेषाद् ग्रहगुणैः ॥ २९ ॥ 3 राइयंशकला विकला शेषात्कथितादभीष्टतोष्टात् । यः साधययुपरिमान समध्यमा कुदकज्ञः स ॥ ३० ॥ इति श्री कुहक प्रकरणम् २९. (घ) १. गुण (ग) गुग्ग: for ( गुणे) २. युतछेद (ग) हृताछेद : for ( युते छेदः) ३. गौ: (ग) गणौ for (गुण:) (वि० -- इसकी श्लोक संख्या २४ है) ४. हृद: for (हत) ५. न तदुक्त for (तत' ) ६. फलमेवं for ( फलमेव) (च) १. गुणों शेषयुतां for ( गुणे शेषयुते ) ४. हृतः for (हृत) ३. युगौ: for (धुगुणै:) (ङ) १. (वि० – इसकी क्रम संख्या २४ है ) - १. गुण: for ( गुणे) ४. हृतः for (हल) ३. युगसौ for गुण:) २. युतश्छेद: for (युते छेदः) ७. शेषाद्ग्रह for (शेषाद्ग्रह) ३०. (घ) १. त्युपरिमान् (ग) त्युपरिषमान् for (परिमान) ५. वि० – मूल में 'इति श्री' पद नहीं है । २. कुहकश: (ग ) for (कुदकज्ञ: स ) (वि- इसकी श्लोक संख्या २३ है) ३. विकलांशशेषात् for (विकलाशेषात् ) ४. समयमा for (समध्यमा) (घ) १. साधयत्युपरिमात् for ( साधयद्यपरिमान्) ४. समध्यमात् for (समध्यमा) ५. 'इति श्री' लुप्त ६. कुदक for (कुहक) ( वि० – इसकी क्रमसंख्या २३ है) ७. नष्टात् for (नष्टात्) ४. समध्यमान् for (समध्यमा) २. कुटुकश: for (कुदकश:) ५. 'इति' से- एम्' तक सब लुप्त | १. साधयत्युपरितनान् for (साधययुपरिमान्)
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