3 क्षेत्रव्यवक्षेत्रफलं वेत्रगुणं समखातफलहतं त्रिभिः शून्या | मुखतुल्यतुल्यभुजंक्यातेकाग्रतानि समरस्त्रः ॥ ४४ ॥ मुखतुलयुतिः दलगुरिगतं वेवगुणं व्यासहारिकं गरिगतम् । मुखतलगुण क्यार्द्ध घेत गणितमौच्चम् ॥ ४५ ॥ उद्गणिताद्विशोध्य व्यवहारफलं त्रिंभिर्भजेद्देशम् । लब्धं व्यवहारफले प्रक्षिप्य फलं भवति सूक्ष्मं ॥ ४६॥ १ www. ४४. (घ) १. + थ्र्थ खात: + २. ( क्षेत्र व्यव' - यहाँ लुप्त है ) २. (ग) + क्षेत्रव्यवहारः + ३. हृतं (ग) for (हतं) ४. शून्या: (ग ) सुध्या: for (शून्या) ५. सुषतुल (ग) मुखतुल (च) for (मुखतुल्य) ६. न्येका (ग) न्यँकाग्र for (नेकाग्र) ७. समरज्जु: (ग) (ङ) for ( समरस्त्रः ) (ग) ८. फलं (च) (ङ) for (फल) (च) २. क्षेत्रे व्यवहारः समाप्त:, अथ खात: for ( क्षेत्रव्यव) ४. शुन्या: for (शून्या) ६. कामानि for (कहतानि ) ७. समरस्रः for (समरस्त्रः) (ङ) २. 'क्षेत्रव्यव' लृप्त ४. सूच्या for (अन्य ) ५. मुखतलतुल्य for ( मुखतुल्यतुल्य) ४५. (घ) १. तल (ग) मुखतसयुति (च) for ( मुखतुलयुतिः ) २. गणितं (ङ) for (गुणितं ) ३. व्यावहारिक (ग) (च) (ङ) for (व्यासहारिक ) ४. गणितक्यार्द्ध (ग) मुखवगतैक्या for (गुराँक्या ) ५. मौद्रम् (ड्रम्) (ग) मौत्र for ( मौच्चम् ) (ग) ६. गुणम् for ( गरिणत ) (च) १. मुखतलयुति for ( मुखतुलयुतिः) ४. गणितैक्या (ङ) for (गुरक्यार्द्ध) ५. मौम् for (मौच्चम् ) (ङ) १. मुखतलयुति for (मुखतुलयू तिः) ६. + स्याद् + ५ मोत्रम् for (मौच्चम्) ४६. (घ) १. छेषम् (ग) च्छेषम् for (छेशम् ) (ग) २. for (उद्र) (च) २. तुद्र for (उद्र) १. छेषं for (छेशम् ) (ङ) २. श्रौत्र for ( उद्र ) ३. भजेत् त्रिभिः शेषम् for ( त्रिभिर्भजे देशम्) ४. भवति फलं सुक्ष्मम् for ( फलंभवतिसूक्ष्मम् )
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