पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/६५

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११५६ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ‘गूहत्रयान्तिमयुतेर्दशदिनानि व्यतीतानि तदा कल्पगतं कि' मिति प्रश्नोत्तरमा नेयम् । एवं त्र्यादिगृहयुगगतानयनं कार्यम् ।। ६ ।। वि. भा-छेदवधस्यैतस्य पूर्वेश्लोकेन सम्बन्धः । द्वियुगं (द्वयोग्रहयोर्योगः) छेदवधो भवति । युगगतं (अन्तिमयोगाद्यद्गतं) तत् द्वयोश्छेदयोरग्र' (शेषं) भवति, एवं कुद्दाकारेण त्र्यादिग्रहयुगगतानयनं कार्यम् । यथैको ग्रहो दिनचतुस्त्रिंशता ऽन्यच्च त्रयोदशदिनैरेकं भगणं भुङ्क्त तयोरन्तिमयुतेर्दशदिनानि व्यतीतानि तदा कल्पात् कियन्ति दिनानि व्यतीतानीति प्रश्ने को राशिश्चतुस्त्रिशद् भक्तो दशशेषस्त्रयोदशभक्तश्त्र दशशेष इति प्रश्नोत्तरेणैव तदुत्तरसिद्धिः । अत्र शेषयोः समत्वादधिकशेषसम्बन्धिहरश्चतुस्त्रिशदेव कल्पितः । ततः पूर्वप्रकारेण शेष योरन्तरं शून्यं गृहीत्वा गुणकारं शून्यं प्रकल्प्याग्रान्तः शून्यसमो वा द्वितीयहार समस्तदा राशिः=ह. ह--श अय शषा हरघातश्च हर इत्यकस्य प्रकल्प्यान्यस्यक भगणकालस्तद्धरस्तच्छेषश्च पूर्वशेषसमः=शे इति प्रकल्प्य पुनः , कुट्टाकारेणैव ग्रहान्तिमयुतेर्दशदिनानि व्यतीतानि तदा कल्पगतं किमिति प्रश्नोत्तरमानेयम् । एवं त्र्यादिग्रह युगतानयंनं कर्तव्यमिति ।। ६ ।। अब विशेष कहते हैं । हेि. भा.-दो ग्रहों का योग छेदवध (हर घात) होता है अन्तिम योग से जो गत है वह दोनों हर का शेष होता है। एवं कुट्टाकार से व्यादि ग्रहयुगगतानयन करना चाहिये । जैसे एक ग्रह चौंतीस दिन में अन्य ग्रह तेरह दिन में एक भगण को भोग करता है। दोनों का अन्तिम योग से दश दिन का समय व्यतीत हुआ तब कल्प से कितने दिन व्यतीत हुए इस प्रश्नमें कौन राशि है-जिस को चौंतीस से भाग देने से दस शेष रहता है। तेरह से भाग देने से दस शेष रहता है इस प्रश्न के उत्तर ही से उसकी उत्तर सिद्धि होती है। यहां शेषद्वय के समत्व से अधिक शेष सम्बन्धी हर चौंतीस ही कल्पना किया गया । तब पूर्व प्रकार से दोनों शेषों के अन्तर को शून्य मानकर गुणकार को शून्य कल्पना करं एक भगण काल-उसका हर और शेष पूर्वशेष शे के बराबर कल्पनाकर पुन: कुट्टक से ग्रह के अन्तिम योगसे दश दिन व्यतीत हुए तब कल्पगत क्या है इस प्रश्न का उत्तर लाना चाहिये । इस तरह तीन आदि ग्रहों का युग गतानयन करना चाहिये ।। ६ ।। इदानीं भगणादिशेषतो ऽहर्गणानयनमाह । भगणादिशेषमग्र' छेदहृतं खं च दिनजशेषहृतम् । अनयोरग्र' भगणादि दिनजशेषोद्धतं थुगणः ॥ ७ ॥ सु. मा-भगणादिशेषं छेदहृतमगू भवति । खं शून्यं दिनजशेषहृतमेकदिन