पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/४८५

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१५७४ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते योदशसंख्यकः पिण्डो रहितः शेषं फलं शीघ्रफलसम्बन्धि पिण्डमानं भवेत् । त्रयोदशचतुर्दशपिण्डयो रन्तरे ई केन्द्रान्तरमस्ति । इति पूर्वमेव ४२ सूत्र प्रतिपादितम् । चतुर्दशपिण्डमानं शून्यसमम् । अतोऽनुपातो यदि विंशतिमितेन त्रिगुणशेषेण विश्वचतुर्दश पिण्डयोरन्तरं विश्वपिन्डसमं लभ्यते तदेष्टशेषेण कि लब्धेन विश्वपिण्डो रहितश्चतुर्दशपिण्डस्याल्पत्वात् शेषं शीघ्रफलसम्बन्धि पिण्ड- मानं भवेत् ।४५॥ अब विश्व के बराबर गतपिण्ड में विशेष नियम कहते हैं । हि. भा–चतुर्दश (१४) संख्यक एष्य पिण्ड हो तो विकल शेष को त्रयोदश (१३) के बराबर पिण्ड से गुण’ । उसमें नख (२०) से भागदें जो हो, उसको तेरहवें । फल पिण्ड में से घटा देने पर शेष शीघ्रफल सम्बन्धी पिण्डमान होगा। उपपत्ति । तेरह और चौदह पिण्ड का अन्तर हुँ५ में केन्द्रान्तर है यह बात पहले ही ४२ सूत्र में कही गई है। चौदहवां पिण्डमानः =० । अब अनुपात करते हैं । बीस के तुल्य त्रिगुणशेष में तेरह चौदह पिण्ड का अन्तर तेरह पिण्ड के तुल्य मिलता है तो इष्टशेष में क्या लाभ जो हो उसको विश्व (१३) पिण्ड में घटा देने पर शेष शीघ्रफल सम्वन्धी पिण्डमान होगा। यहां चौदहवां पिण्ड छोटा है इसलिये १३वें पिण्ड में फल को घटा दिया गया है । इदानीं पिण्डतः शीघ्रफलमाह । पिण्डफलनवमभागो भागादिफलं ग्रहेषु वा स्वमृणम् । चलकेन्द्र मेषादौ तुलादिके कारयेत् क्रमशः ॥ ४६ ॥ सु. भा–पिण्डफलस्य नवमांशो भागादिशम्रफलं भवेत् शेषं स्पष्टार्थम् । नवगुणितं भागादि शीघ्रफलमेव पिण्डकाः पठिताः इति ४२ सूत्र प्रतिपादितम् । अतः पिण्डफलं नवहृतं भागादि शीघ्रफलं भवति धनर्णवासना स्पष्टाधिकारतः स्फुटा ।४६। अब पिण्ड पर से शी व्र फल लाते हैं । हि. भा.-पिण्ड फल का नवम भाग भागादि शीघ्र फल होता है । इस फल को