पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/४८०

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ध्यानग्रहोपदेशाध्यायः १५६४ त्रिगुणा त्रिशद्भक्ता रविजस्य फलस्य मन्वफललिप्ताः। मन्दफलयतोनं स्वशीघ्रोच्चाच्छोधयेन्मध्यम् ॥ । ३ ॥ सु. भा.-स्पष्टाधिकारोक्तमन्दपरिधिना भौमादीनां स्वल्पान्तरात् परममं दफल कलाः । भौ=६७०’ । बु=३६२’। गु= ३१४ । शु= १०५ । श८४७६ । ततो यदि त्रिज्यया परममन्दफलकलास्तदा केन्द्रज्यया किमु । जाता मन्द = = ज्याके ६७० ज्याके ६७ ६७४३२ ज्युके फलकलाः, भ= १५ १५ १५४३२ ६७३२ ३२ ज्याके ३२ ज्याके स्वल्पान्तरात् । ४८० ४८० ६७ – ३६२ ज्याके - ७ ज्यके स्वल्पान्तरात् । १५० गु= - =२ ज्याके स्वल्पान्तरात् । ३१४ ज्याके १५० = _ == = - - ३०५ ज्याके __२ ज्याके । श= ४७६ ज्याके =३ ज्याके+ २६ ज्याके १५० ८ ३ ज्याके+ ज्याके स्वल्पान्तरात् ॥३८-३९॥ । अब भौमादि ग्रहों का मन्दफलानयन करते हैं । हि. भा–फेन्द्रज्या को रद (३२) से गुणाकर सप्त (७) सात से भाग देने पर भम की मन्दफलकला होती है । केन्द्रज्या को नग (सात) से गुणकर तीन से भाग देने पर बुध की मन्दफलकला होती है। द्विगुणित को केन्द्र के गुरु की मन्दफल कला होती है। द्विगुणित केन्द्रज्या,को तीन से भाग देने पर शुरू की मन्दफलकला होती है । केन्द्रज्या को तीन से गुणकर तीस से भाग देने पर शनि की मन्दफल कला होती है। उपपत्ति । स्पष्टाधिकार में कही गई मन्दपरिधि से भौमादिग्रहों की स्वल्पान्तर से परम मन्द फलकला पठित है । भौम की=६७०बुध की= ३६२’ । गुरु की=३१४ । शुक्र की =t१०५’। शनि की=४७६’ इस पर से घी राशिक अनुपात से भोमादिग्रहों की मन्दफल